आख़िर पैट्रिआर्क निकोन ने आइकनों की आँखें क्यों निकाली?
17वीं सदी के मध्य में रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च का नेतृत्व पैट्रिआर्क निकोन कर रहे थे। वे एक किसान परिवार से आए थे, लेकिन अपनी बुद्धिमत्ता और मेहनत के दम पर चर्च के प्रमुख बने और ज़ार (सम्राट) अलेक्सेई मिखाइलोविच के सबसे करीबी सलाहकारों में शामिल हो गए।
निकोन ने चर्च में बड़े पैमाने पर सुधार शुरू किए। उनका उद्देश्य रूसी धार्मिक अनुष्ठानों को यूनानी परंपराओं के अनुरूप बनाना था, जिन्हें वे अधिक प्राचीन और सही मानते थे। आगे चलकर इन्हीं सुधारों के कारण चर्च में विभाजन हुआ और कुछ श्रद्धालुओं ने इन बदलावों को मानने से इनकार कर दिया। इन्हें ओल्ड बिलीवर्स कहा गया।
सुधारों के दौर की सबसे क्रूर घटनाओं में से एक थी निकोन का तथाकथित “फ्र्याज़” (Fryazh) आइकनों के खिलाफ अभियान। उस समय पश्चिमी यूरोपीय कला का प्रभाव रूस में बढ़ रहा था और कुछ रूसी आइकन पेंटर संतों को पहले की तुलना में ज़्यादा वास्तविक और जीवंत अंदाज़ में चित्रित करने लगे थे, कुछ हद तक इतालवी कला की तरह। ऐसे आइकनों को “फ्र्याज़िन्स्की” (fryazhinskie) कहा जाता था। यह नाम “फ्र्याज़िन” (fryazin) शब्द से आया था, जिसका इस्तेमाल विदेशी, खासकर इटालियनों के लिए किया जाता था।
कार्प ज़ोलोतारेव का आइकन "द वर्जिन एंड चाइल्ड" (17वीं सदी के आखिर में, सेंट्रल म्यूज़ियम ऑफ़ आर्कियोलॉजी एंड एस्ट्रोनॉमी)। फ्र्याज़ स्टाइल का एक शानदार उदाहरण।
लेकिन निकोन को सबसे ज़्यादा आपत्ति इस बात से थी कि इन आइकनों में कई बार संतों की जगह उन लोगों का चेहरा ज़्यादा साफ़ दिखाई देता था, जिन्होंने कलाकारों के लिए मॉडल के तौर पर पोज़ दिया था। ये लोग अक्सर कुलीन वर्ग से होते थे। पैट्रिआर्क को यह ईशनिंदा जैसा लगता था, क्योंकि उनके अनुसार इससे एक पवित्र धार्मिक छवि एक आम सांसारिक पोर्ट्रेट में बदल रही थी।
1654 की गर्मियों में, निकोन ने आदेश दिया कि इस तरह की “विधर्मी” शैली में बनाए गए सभी आइकनों को लोगों से ज़ब्त कर लिया जाए। इन आइकनों को कुलीन बोयारों से लेकर आम शहरवासियों तक, सभी के घरों से इकट्ठा किया गया। उस समय रूस की यात्रा कर रहे सीरियाई आर्कडीकन पॉल ऑफ अलेप्पो ने इन घटनाओं को अपनी आँखों से देखा था। उन्होंने बाद में इन घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया।
पॉल ऑफ अलेप्पो के बयान के अनुसार, निकोन ने खुद इन आइकनों के खिलाफ की गई कार्रवाई में हिस्सा लिया था। उन्होंने अपने हाथों से उन आइकनों पर बने संतों की आँखें निकाल दीं। इसके बाद उन्होंने ज़ार के ‘स्त्रेलत्सी’ (सशस्त्र सैनिकों) को इन क्षतिग्रस्त आइकनों को मॉस्को की सड़कों पर ले जाने का आदेश दिया। सरकारी घोषणाकर्ता ज़ोर-ज़ोर से आदेश पढ़कर लोगों को चेतावनी देते थे कि इस तरह के आइकन बनाने या अपने पास रखने वालों को सज़ा दी जाएगी। इस तरह निकोन का मकसद सिर्फ़ उस चीज़ को नष्ट करना नहीं था, जिसे वे विधर्म मानते थे, बल्कि लोगों को सार्वजनिक रूप से डराना भी था।
ज़ार अलेक्सेई मिखाइलोविच का चित्र
पॉल ऑफ अलेप्पो के अनुसार, निकोन ने इनमें से कई आइकनों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया और उन्हें आग में फेंक दिया। पैट्रिआर्क का यह गुस्सा ज़ार अलेक्सेई मिखाइलोविच पर गहरा असर डाल गया। उन्होंने बीच में हस्तक्षेप किया और आदेश दिया कि इन आइकनों को जलाया न जाए, बल्कि ज़मीन में दफनाया जाए, जैसा कि उन पुराने और खराब हो चुके आइकनों के साथ किया जाता था, जिनकी मरम्मत संभव नहीं होती थी।
इसके अलावा, कुछ आइकनों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया गया। उनकी ऊपरी रंग की परत को केवल खुरचकर हटा दिया गया और उसके ऊपर संतों के नए चेहरे बनाए गए, इस बार बाइज़ेंटाइन परंपरा के नियमों के बिल्कुल अनुरूप।
व्याचेस्लाव श्वार्त्ज़। ‘पैट्रिआर्क निकॉन इन न्यू जेरूसलम’, 1867
“फ्र्याज़” आइकनों पर अंतिम फैसला 1656 में हुई एक चर्च काउंसिल में सुनाया गया। काउंसिल ने आधिकारिक तौर पर उन सभी लोगों को चर्च से बहिष्कृत करने का फैसला किया, जो इसके बाद भी “पश्चिमी” शैली में आइकन बनाते या अपने पास रखते। बचे हुए आइकनों को विधर्मी घोषित कर दिया गया और उन्हें नष्ट करने का आदेश दिया गया।