USSR में स्कूल का पहला दिन कैसा होता था?
1 सितंबर को सभी सोवियत बच्चे अपनी प्रेस की हुई यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल पहुँचते थे।
क्लास शुरू होने से पहले, एक 'लिनेय्का' होती थी — यानी स्कूल के आँगन में सभी बच्चों की परेड। हर क्लास अपने क्लास नंबर वाला बोर्ड लेकर खड़ी होती थी।
फिर प्रिंसिपल स्वागत भाषण देते थे।
उसके बाद 'पहली घंटी' बजती थी — जो स्कूल की शुरुआत का प्रतीक थी। इसमें एक 11वीं क्लास का लड़का पहली क्लास की एक छोटी बच्ची को अपने कंधे पर बिठा लेता था, और वह घंटी बजाती थी।
और पूरी क्लास औपचारिक रूप से अपनी पहली क्लास में जाती थी।
पहले दिन टीचर्स बच्चों पर ज्यादा सख्ती नहीं करते थे। वह पिछली क्लास की चीज़ें दोहराते थे, और अक्सर 'मैंने गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बिताईं' पर निबंध लिखने को कहते थे।
1 सितंबर को 'शांति पाठ' भी होते थे, जिसमें बच्चों को शांति की अहमियत समझाई जाती थी।
इस दिन स्कूलों में WWII के सैनिक भी आते थे, और बच्चों को अपनी जंग की कहानियाँ सुनाते थे।
सोवियत बच्चों के लिए यह दिन खुशी का होता था, क्योंकि वह अपने दोस्तों से दोबारा मिलते थे — जिन्हें उन्होंने पूरी गर्मियों में नहीं देखा था।
लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं — कई को इस बात का दुख भी होता था कि मस्ती भरी गर्मियाँ खत्म हो गईं।
'नॉलेज डे' का सबसे बड़ा प्रतीक थे — फूल। हर बच्चा अपनी क्लास टीचर के लिए गुलदस्ता लेकर आता था।
और इस खास दिन पर, माता-पिता अपने बच्चों की यूनिफॉर्म में तस्वीरें जरूर लेते थे।