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रूसी साम्राज्य में रईसों की दावतें कैसी होती थीं?

State Hermitage Museum
डिनर का समय मेज़बान की उम्र कैसे बताता था? दावत कितनी देर चलती थी और आखिर कैसे खत्म होती थी?

दावतें कितने बजे शुरू होती थीं?

किसी घर में रात का खाना किस समय परोसा जाता था, इससे न सिर्फ़ उस परिवार की जगह और जीवनशैली, बल्कि मेज़बानों की उम्र का भी अंदाज़ा लगाया जा सकता था।

18वीं सदी के अंत में सम्राट पावेल I सेना की सख्त दिनचर्या को आदर्श मानते थे। उन्होंने कुलीनों को भी सुबह सूरज निकलते ही अपना दिन शुरू करने की सलाह दी। उनके शासनकाल में भोजन भी काफी जल्दी होता था, आमतौर पर दोपहर 12 या 1 बजे।

लेकिन 19वीं सदी की शुरुआत में रूसी साम्राज्य में एक नया चलन आया। अब लोग शाम को 5 से 7 बजे के बीच खाना खाने लगे। यह खासकर युवाओं के बीच लोकप्रिय था, जबकि उम्रदराज़ रईस अपनी पुरानी आदत के चलते अब भी दोपहर के आसपास भोजन करते थे।

नए फैशन और तौर-तरीके दूर-दराज़ के इलाकों तक पहुंचने में समय लेते थे। ग्रामीण इलाकों में सेंट पीटर्सबर्ग जैसी देर रात की पार्टियां भी नहीं होती थीं। लोग जल्दी सो जाते थे, इसलिए वहां डिनर भी दोपहर 12 से 4 बजे के बीच ही कर लिया जाता था।

Russian Museum

धीरे-धीरे खाने के समय के आधार पर भी लोगों की एक पूरी श्रेणी बन गई। जो परिवार दोपहर 12 बजे खाना खाते थे, उनके मेज़बान आमतौर पर उम्रदराज़ और पुराने विचारों वाले होते थे। जो लोग अपना ज़्यादातर समय गांव की हवेली में बिताते थे, वे शाम 4 बजे तक खाना खाते थे। वहीं शाम को फैशनेबल और हाई सोसाइटी के लोग डिनर करते थे।

अगर कोई परिवार यूरोपीय अंदाज़ में खाना खाता था और शाम को कोई रिसेप्शन नहीं रखता था, तो रईस रात में दोबारा खाना नहीं खाते थे। शाम को बस चाय के साथ पेस्ट्री और हल्की-फुल्की चीज़ें परोसी जाती थीं। लेकिन बॉल में देर रात कई तरह के शानदार व्यंजनों के साथ बाकायदा डिनर परोसा जाता था।

जब अचानक मेहमान आ जाएं

कुलीन परिवारों में खाना बनाना घर के लोगों का काम नहीं था। कम आमदनी वाले परिवार भी एक रसोइया रख लेते थे और घर पर भोजन करते थे। लेकिन सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को के कुंवारे रईस अक्सर रेस्तरां या स्थानीय खान-पान की जगहों पर भोजन करते थे।

रईसों के घरों में भोजन बड़ी संख्या में मेहमानों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता था। रोज़ाना 30, 50 और कभी-कभी 100 लोगों तक के लिए मेज़ सजाना आम बात थी। ऐसे भी कई किस्से हैं जिनमें कुछ लोग वर्षों तक एक ही परिवार के यहां भोजन करने आते रहे, और घरवालों तक को नहीं पता था कि वे हर बार वहां क्यों पहुंचते थे।

ऐपेटाइज़र से डेज़र्ट तक, घंटों चलने वाली दावत

सबसे पहले मेहमान रिसेप्शन रूम में इकट्ठा होते थे, जहां मेज़बान खुद उनका स्वागत करते थे। सभी मेहमानों के आने के बाद स्टार्टर और ऐपेटाइज़र परोसे जाते थे। इसके लिए करीब 15 मिनट का समय होता था। फिर मेहमानों को असली दावत के लिए डाइनिंग रूम में ले जाया जाता था।

State Memorial Historical, Artistic and Natural Museum-Reserve of V.D. Polenov

खाने की चीज़ें खास ऊंची ट्रे में सजाई जाती थीं, जो मेज़ से ऊपर उठी होती थीं। अगर दावत बहुत बड़ी हो, तो इन ट्रे की लंबाई कई मीटर तक हो सकती थी।

पूरा डिनर कई घंटों तक चलता था। इस दौरान एक के बाद एक कई व्यंजन परोसे जाते थे, और हर बार नए व्यंजन मेज़ पर सजाए जाते थे।

छोटे से छोटे कुलीन घर में भी मेज़बान का खुद खाना परोसना अच्छा नहीं माना जाता था। यह उनके लिए अनुचित और असभ्य समझा जाता था। हाँ, मेज़बान मेहमानों के लिए वाइन सर्व कर सकता था।

घंटों चलने वाली दावत आखिर में डेज़र्ट पर आकर खत्म होती थी। इसके बाद मुंह का स्वाद तरोताज़ा करने के लिए पानी के प्याले परोसे जाते थे। फिर मेहमान या तो विदा हो जाते थे या मेज़ से दूर हटकर बातचीत और मेलजोल में समय बिताते थे। 

आर्टिकल का पूरा वर्ज़न (रूसी में) Culture.Ru वेबसाइट पर मिल जाएगा।

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