सम्राट के ज़माने का कोको USSR और आधुनिक रूस में कैसे लोकप्रिय हुआ?
‘ज़ोलोतोय यार्लिक’ यानी ‘गोल्डन लेबल’ कोको का पहला ज़िक्र 1908 में आता है, जब यह ‘आइनेम’ कन्फेक्शनरी फैक्ट्री की सूची में शामिल हुआ। इसी फैक्ट्री में इसी नाम की डेज़र्ट चॉकलेट भी तैयार की जाती थी।
‘ज़ोलोतोय यार्लिक’ (यानी ‘गोल्डन लेबल’) कोको
कोको रईसों और बोहेमियन अभिजात वर्ग का पसंदीदा ड्रिंक था, जैसे सिल्वर एज के कवियों का। व्लादिमीर मायाकोवस्की ने भी इस ड्रिंक की खासियत पर कविता लिखीं।
1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद, कन्फेक्शनरी बनाने के काम का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया और तब से उस फ़ैक्ट्री को ‘क्रास्नी ओक्त्याब्र’ (‘रेड अक्टूबर’) के नाम से जाना जाने लगा।
और धीरे-धीरे कोको आम लोगों का ड्रिंक बन गया, जिसके विज्ञापनों में इसके सेहत के फायदों और भरपूर स्वाद को दिखाया जाता था। वैसे, ‘ज़ोलोतोय यार्लिक’ में कोई चीनी नहीं डाली जाती, इसमें सिर्फ यही चीज़ें होती हैं: कोको पाउडर और वनीलिन फ्लेवरिंग।
साथ ही, इसमें कम से कम 15% फैट होता है, जिसे USSR में बहुत महत्व दिया जाता था, क्योंकि यह हाई-कैलोरी ड्रिंक बच्चों को खूब दिया जाता था। इसके अलावा, वैज्ञानिकों ने पाया कि कोको दिमाग की कार्यक्षमता पर सकारात्मक असर डालता है!
1960 के दशक में, उत्पादन छह गुना तक पहुँच गया और उसी दौरान हरे पैकेजिंग का वह डिज़ाइन पहली बार आया, जो आज भी इतना मशहूर है। कच्चे माल या कोको बीन्स की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के उन समाजवादी देशों से, जो सोवियत संघ के मित्र थे, कोको बीन्स भरपूर मात्रा में मिलती थीं।