मॉस्को मेट्रो के सबसे खूबसूरत स्टेशन: 'कोमसोमोल्स्काया'
'कोमसोमोल्स्काया' स्टेशन जो कि सर्कल लाइन पर है, 30 जनवरी, 1952 को खोला गया था। उस समय, युद्ध के बाद के सोवियत संघ के आर्किटेक्चर में 'स्टालिनिस्ट एम्पायर' स्टाइल का बोलबाला था। यह स्टाइल क्लासिसिज्म, प्राचीनता, बारोक और निश्चित रूप से एम्पायर स्टाइल से प्रेरित थी।
इस स्टेशन को उस समय के प्रमुख सोवियत आर्किटेक्ट अलेक्सेई शुसेव ने डिज़ाइन किया था, जिन्होंने व्लादिमीर लेनिन का मकबरा भी बनाया था। स्टेशन हॉल में दो कतारों में विशाल खंभे लगे हैं, जो इसे आर्केड जैसा बनाते हैं।
इस स्टेशन को उस समय के प्रमुख सोवियत आर्किटेक्ट अलेक्सेई शुसेव ने डिज़ाइन किया था, जिन्होंने व्लादिमीर लेनिन का मकबरा भी बनाया था। स्टेशन हॉल एक आर्केड है जिसमें बड़े-बड़े खंभों की दो लाइनें हैं।
इस स्टेशन को इसलिए बनाया गया था कि यह मॉस्को का प्रवेश द्वार लगे — जो भी यहाँ आए, वह हैरान रह जाए। इसी सोच से इसकी वॉल्ट्स पर सोने का स्माल्ट चढ़ा है, जो कॉपर लैम्प्स की रोशनी में और भी चमचमाते हैं।
कहा जाता है कि यहाँ के झूमर 'पैनिकाडिलो' स्टाइल में बने हैं — यानी वैसे बड़े-बड़े झूमर, जो रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्चों में लगते हैं।
वॉल्ट्स को 'बस-रिलीफ' और मोज़ेक पैनलों से सजाया गया है, जिनमें रूसी इतिहास के दृश्य दिखाए गए हैं।
मोज़ेक के डिज़ाइन आर्टिस्ट पावेल कोरिन ने बनाए थे — और ये सभी रूसी लोगों की जीत और उनकी बहादुरी की कहानियाँ बताते हैं। इनमें अलेक्सांद्र नेवस्की, दिमित्री दोंस्कॉय, कुज़्मा मिनिन और दिमित्री पॉज़र्स्की, अलेक्सांद्र सुवोरोव, मिखाइल कुतुज़ोव, और रैहस्टाग की दीवारों पर खड़े अज्ञात सोवियत सैनिक भी हैं।
स्टेशन की दीवारें उज़्बेकिस्तान के बेज संगमरमर से बनी हैं।
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