द्वितीय विश्व युद्ध में रेड आर्मी की 3 सबसे बड़ी हार

Keystone-France/Gamma-Keystone/Getty Images
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उस समय सोवियत सेना ने लाखों सैनिक खो दिए और वेहरमाच मॉस्को, स्टालिनग्राड और कॉकेशस तक पहुँच गई।
  1. ‘द कीव कॉल्ड्रॉन’
Archive Photos/Getty Images
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सोवियत यूक्रेन की राजधानी की लड़ाई 11 जुलाई, 1941 को शुरू हुई थी। उसी दिन शहर के रक्षा कमांडरों को स्टालिन का एक संदेश आया — “अगर तुमने अपने सैनिकों को नीपर नदी के बाएँ किनारे पर वापस ले जाने के लिए एक भी आगे कदम बढ़ाया... तो तुम सभी को कायरों और देशद्रोहियों की तरह कठोर सज़ा दी जाएगी।”

कीव की रक्षा कर्नल जनरल मिखाइल किरपोनोस की साउथवेस्टर्न फ्रंट के सैनिक कर रहे थे। शुरू के कुछ हफ्तों में उन्होंने जमकर अपनी जगह बनाए रखी और दुश्मन के घुसपैठ के हर प्रयास को नाकाम कर दिया। अगस्त के मध्य में जर्मनों ने कीव के दक्षिण में नीपर नदी पार की और बाएँ किनारे पर कब्ज़ा करके शहर को दक्षिण से घेरना शुरू कर दिया। वहीं, आर्मी ग्रुप सेंटर का एक हिस्सा, जिसे हिटलर ने मॉस्को की तरफ से वापस बुला लिया था, उत्तर से आगे बढ़ने लगा।

हालाँकि घेराबंदी का खतरा बढ़ता जा रहा था, फिर भी स्टालिन ने सेना को वापस बुलाने में बहुत देर कर दी। 15 सितंबर को दक्षिण-पश्चिमी मोर्चे की सेना पूरी तरह से घिर गई। वहाँ की सेना ने आगे बढ़ने की कोशिश की, मगर कुछ टुकड़ियाँ ही अपनी लाइनों तक पहुँच पाईं। 19 सितंबर को जर्मन सेना ने कीव पर कब्जा कर लिया।

कीव की इस रक्षात्मक लड़ाई में 7 लाख से ज़्यादा रेड आर्मी जवान मारे गए, घायल हुए, पकड़े गए या लापता हो गए। इससे जर्मनों के लिए पूर्वी यूक्रेन और क्रीमिया में आगे बढ़ने का रास्ता खुल गया। उसी समय, आर्मी ग्रुप सेंटर की सेना के कुछ हिस्से के कीव की ओर मुड़ने से मॉस्को पर दबाव कम हो गया, जिससे सोवियत को राजधानी की रक्षा की तैयारी करने का समय मिल गया।

  1. ‘द व्याज़मा कॉल्ड्रॉन’
Viktor Kinelovsky/Sputnik
Viktor Kinelovsky/Sputnik

30 सितंबर, 1941 को मॉस्को के खिलाफ जर्मन हमला शुरू हुआ, जिसे ‘ऑपरेशन टाइफून’ के नाम से जाना जाता है।

वेहरमाच ने रेड आर्मी की मज़बूत डिफेंसिव लाइनों के बीच से सीधे मॉस्को की ओर बढ़ने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने सोवियत सेनाओं के बीच के जंक्शनों पर हमला किया और उनकी पिछली लाइनों  तक पहुँच गए।

पीछे हटने का ऑर्डर बहुत देर से आया और व्याज़्मा क्षेत्र में कई सोवियत सेनाएं घिर गईं। घेरे से निकलने की कोशिश में, डिवीज़नों ने अपने 90 परसेंट तक सैनिक खो दिए।

“हम गाँवों में जाते, छिपने की जगह ढूँढते, फिर आगे निकल जाते... अक्सर भूखे-प्यासे चलते थे, पैरों में दम नहीं रहता था। मगर हिम्मत जुटाते और चलते रहते। जो मिलता, खा लेते... हर किसी से बस एक बात पूछते — 'मॉस्को की तरफ कैसे जाएँ?'” — सैनिक अलेक्सांद्र पोचुएनकोव ने बताया।

मारे गए, घायल हुए, पकड़े गए और लापता सोवियत सैनिकों की सही संख्या पता नहीं है, लेकिन अंदाज़ा है कि वे लगभग 700,000-900,000 थे। इस तबाही ने मॉस्को को लगभग बेसहारा कर दिया और शहर में दहशत फैल गई। सभी मौजूद सेना को, चाहे कितनी भी कम क्यों न हो, डिफेंसिव लाइन में तैनात कर दिया गया, जिसमें मॉस्को इलाके के सैन्य स्कूलों के कैडेट भी शामिल थे।

  1. ‘द बारवेनकोवो कॉल्ड्रॉन’
Anatoly Garanin/Sputnik
Anatoly Garanin/Sputnik

मॉस्को के पास वेहरमाच के हारने के बाद, रेड आर्मी सभी फ्रंट पर आगे बढ़ी। उत्तर-पूर्वी यूक्रेन में, यह दुश्मन की मोर्चेबंदी को झकझोरते हुए अंदर तक घुस गई और तथाकथित बारवेनकोव्स्की सैलिएंट पर कब्ज़ा कर लिया। 12 मई, 1942 को, वहां के सैनिकों ने खार्कोव की ओर हमला किया और कुछ ही दिनों में 50 km आगे बढ़ गए।

मगर 17 मई तक जर्मनों ने सोवियत मोर्चे के सबसे कमज़ोर हिस्से पर धावा बोल दिया। यह जगह सैलिएंट के संकरे हिस्से के पास थी। वहाँ कोई सुरक्षा दीवार नहीं बनी थी, इसलिए दुश्मन बड़ी आसानी से आगे बढ़ गया। दूसरी तरफ, मॉस्को ने जर्मन पलटवार को हल्के में लिया और खार्कोव की ओर हमला जारी रखने का आदेश दे दिया।

इसका नतीजा यह हुआ कि 22 मई को दक्षिण से आगे बढ़ने वाली आर्मी ग्रुप 'क्लिस्ट' (Kleist) बालाक्लेया शहर के दक्षिण में फ्रेडरिक पॉलस की 6वीं सेना के टैंक डिवीजनों से जुड़ गई, जो उत्तर से आ रहे थे। सोवियत सेना चारों ओर से घिर गई। 2,00,000 से ज़्यादा सोवियत सैनिक इस 'कौलड्रन' में फँस गए और सिर्फ 22,000 ही अपनी जान बचा पाए।

खार्कोव में सोवियत सेना का नुकसान कीव या व्याज़मा जितना बड़ा नहीं था, लेकिन USSR के लिए परिणाम उतने ही गंभीर थे। वेहरमाच ने फिर से मोर्चा संभाल लिया और कॉकेशस व वोल्गा की ओर एक जबरदस्त हमला बोल दिया।