रूस में न्यूड कला पहली बार कब दिखाई दी?
रूसी कला, पश्चिमी यूरोपीय कला के विपरीत, बीजान्टिन परंपरा के तहत बनी। वहाँ आइकन बनाने के जो नियम थे, उनमें यह जरूर था कि छवि को जानबूझकर शरीर से परे, अलौकिक दिखाया जाए। यही वजह है कि 18वीं सदी तक, रूस में न्यूड पेंटिंग्स लगभग न के बराबर थीं – जो थीं भी, वो अश्लील थीं, जिनका कला से कोई वास्ता नहीं था।
फिर, 1757 में, सेंट पीटर्सबर्ग में इंपीरियल एकेडमी ऑफ आर्ट्स की स्थापना हुई। अब रूसी कलाकारों ने यूरोपीय कला को सीखना और अपनाना शुरू कर दिया। यह अकादमी न केवल कला की पढ़ाई कराती थी, बल्कि पूरे देश के कलात्मक जीवन को भी नियंत्रित करती थी।
इवान अकीमोव। हरक्यूलिस अपने मित्र फिलोक्टेट्स की उपस्थिति में चिता पर खुद को जलाते हुए, 1782
पढ़ाई का सिस्टम यूरोपियन मॉडल पर आधारित था: स्टूडेंट्स पहले प्लास्टर की मूर्तियों से ड्रॉइंग बनाई, फिर एकोर्शे (écorché) – यानी हड्डियाँ, मांसपेशियाँ, नसें दिखने वाली मूर्तियां बनाईं। और आखिरकार, स्टूडेंट्स को लाइफ ड्रॉइंग क्लास में एडमिशन मिलता था, जहाँ असली मॉडल को बैठाकर चित्र बनाना सिखाया जाता था। पुरुष लाइफ क्लास 1760 में मूर्तिकार निकोला-फ्रांस्वा जिले की पहल पर अकादमी में खोली गई थी। महिला लाइफ क्लास बहुत बाद में आई – पहली बार इसे 1893 में मॉस्को स्कूल ऑफ पेंटिंग, स्कल्पचर एंड आर्किटेक्चर ने आयोजित किया था।
"धीरे-धीरे, न्यूड कला महज़ एक अध्ययन सामग्री से एक अलग विधा – सौंदर्य का एक रूप बन गई" त्रेत्याकोव गैलरी की डिप्टी हेड येवगेनिया इल्युखिना कहती हैं।
"हर कलाकार के अपने लक्ष्य थे, अपनी कहानी कहने का अपना तरीका था, और अनुभव को सौंदर्य का एक अलग रूप देने का अपना अंदाज था," इल्युखिना ने आगे बताया।
प्योत्र सोकोलोव। वीनस एंड एडोनिस, 1782
18वीं सदी की पेंटिंग्स मुख्य रूप से ऐतिहासिक, पौराणिक और धार्मिक विषयों पर बनती थीं। पेंटिंग का सौंदर्य था – आदर्श मानव शरीर, सामंजस्यपूर्ण अनुपात और सुंदरता। न्यूड बॉडी को बिल्कुल वैसा ही (नैचुरल) चित्रित करना या उसमें यथार्थवाद लाना गलत माना जाता था। सब कुछ रूपक (एलेगोरिकल) के रूप में दिखाना सही तरीका था।
प्योत्र सोकोलोव। डेडालस इकारस को पंख बांधते हुए, 1777
न्यूड फिगर बनाने वाले शुरू के कलाकारों में प्योत्र सोकोलोव थे – उनकी पेंटिंग्स 'डेडालस इकारस को पंख बांधते हुए' (1777) और 'वीनस एंड एडोनिस' (1782)। आखिरी वाली पेंटिंग के लिए उन्हें शिक्षाविद् का दर्जा भी मिला।
एक और नाम था इवान अकीमोव। उनके काम का एक बेहतरीन उदाहरण है 'द सेल्फ-इमोलेशन ऑफ हरक्यूलिस ऑन अ पायर इन द प्रेजेंस ऑफ हिज फ्रेंड फिलोक्टेट्स' (1782)।
इन पेंटिंग्स के दृश्य पूरी तरह से आदर्शित और पौराणिक थे। रूसी परिदृश्य या घर के अंदर के दृश्य तो 19वीं सदी में – बहुत बाद में – कैनवस पर आए।
कार्ल ब्रायलोव। बाथशेबा, 1832
कार्ल ब्रायलोव और अलेक्जेंडर इवानोव ने न्यूड आर्ट में क्लासिकिज्म की परंपराओं को चुनौती दी। यह एक बड़ी सफलता थी। ब्रायलोव ने अपनी महिला मॉडलों में एक नई कामुकता घोली। वो उन्हें ज़्यादा जीवंत और हकीकी बनाते थे – जैसा कि 'इटालियन मॉर्निंग' (1823) या 'बतशेबा' (1832) में साफ देखा जा सकता है।
कार्ल ब्रायलोव. इटैलियन मॉर्निंग, 1823
अपनी विशाल पेंटिंग 'द अपीयरेंस ऑफ क्राइस्ट बिफोर द पीपल' (1837-1857) पर काम करते समय, अलेक्जेंडर इवानोव ने शरीर को आदर्श बनाने के पुराने चलन को ठुकरा दिया और उसकी जगह यथार्थवादी चित्रण को अपनाया।
अलेक्सांदर इवानोव. लोगों के सामने ईसा मसीह का प्रकट होना, 1837–1857
मूर्तिकार इवान मार्टोस ने 1813 में अकादमी के तत्कालीन उपाध्यक्ष को लिखे एक पत्र में कहा था:
"शरीर एक अद्भुत परिधान है – एक ऐसा माध्यम… जिसे भगवान की उंगलियों ने बुना है। उस नकल इंसान नहीं कर सकता, चाहे कितनी भी चालाकी दिखा ले।"
यह लेख मूल रूप से (रूसी भाषा में) Culture.ru वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था।