इल्या रेपिन की इस पेंटिंग में आखिर क्या है?
रेपिन की पेंटिंग ‘व्हाट फ़्रीडम!’ (1903) का विचार कुओक्काला (अब रेपिनो, सेंट पीटर्सबर्ग के पास) में देखे गए एक दृश्य से पैदा हुआ। यह जगह फिनलैंड की खाड़ी के किनारे है। 1899 में उन्होंने वहाँ ज़मीन ली, अपना घर खुद डिज़ाइन किया और उसका नाम 'पेनेट्स' रखा — यानी घर की रखवाली करने वाले पुराने रोमन देवताओं के नाम पर। 1903 से लेकर 1930 में अपनी मौत तक वह वहीं रहे। एक दिन समुंदर किनारे टहलते हुए उन्होंने एक स्टूडेंट कपल को देखा, जो अचानक आई लहर से चौंके गए थे।
रेपिन के मुताबिक वो युवा जोड़ा लहरों के तेज़ बहाव से डरा नहीं — बल्कि वे पानी में हँसी-ठिठोली करते रहे। उनकी यही खुशी देखकर पेंटर के मन में इसे बनाने का ख्याल आया। भावनाओं को उतारने के लिए रेपिन ने इंप्रेशनिज़्म जैसी शैली अपनाई — अनियमित, चौड़े ब्रशस्ट्रोक। इस तरह उन्होंने उफनते पानी को बड़ा अनोखा दिखाया, जो आगे हरा पारदर्शी नज़र आता है और पीछे जाकर गहरे नीले रंग में बदल जाता है।
पेंटर ने इस कला की किसी भी दूसरी व्याख्या या अर्थ को नकारा — "बस एक लड़का और लड़की छात्र समुंदर के किनारे 'माज़ुर्का' डांस कर रहे हैं; बस इतना ही है इसमें!" लेकिन लोगों ने इस पेंटिंग में सिंबॉलिज़्म देख लिया। 1903 के उस दौर में, जब पहली रूसी क्रांति करीब थी और समाज बेहद उत्तेजित था, ‘व्हाट फ़्रीडम!’ ने बहुत बड़ी प्रतिक्रिया पैदा कर दी।
वामपंथी विचारधारा वाले सबसे ज़्यादा सक्रिय थे। उन्होंने लहरों के बीच खड़े उस लड़के-लड़की को देखते हुए कहा — यह तो हमारी जवान पीढ़ी है, जो बिना किसी डर के "क्रांति के तूफान" की तरफ बढ़ रही है। उनकी यह बात और पुख्ता हो गई, क्योंकि 19वीं सदी की रूसी कविता और कला में समंदर अक्सर इंक़लाबी ताकत हुआ करता था।
लेकिन आर्ट क्रिटिक व्लादिमीर स्तासोव ने इस बहस का अंत कर दिया। उन्होंने एक ऐसी व्याख्या दी जो सबको राजी कर गई — यह पेंटिंग "उन रूसी नौजवानों की है, जो मुसीबतों से घिरे होने के बावजूद अपनी हिम्मत, उम्मीद और खुशियों की चाहत नहीं खोते।"