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क्या आप जानते हैं कि बॉडी आर्ट 100 साल से भी पहले एक रूसी कलाकार ने शुरू किया था?

Public domain / Legion Media
सितंबर 1913 में कुज़नेत्स्की मोस्त (मॉस्को की एक मशहूर सड़क) पर राहगीर हैरान रह गए – दो लोग, जिनके चेहरे पर रंग-बिरंगा डिज़ाइन बना था, आराम से घूम रहे थे। यह थे कलाकार मिखाइल लारियोनोव और कवि कोंस्तांतिन बोल्शाकोव।

लारियोनोव के दाएँ गाल पर हरा गोला और पीली किरणें बनी थीं। वहीं बोल्शाकोव के गाल, गर्दन और कॉलर पर नीली-लाल धारियाँ और बिंदु थे। लोगों को जब थोड़ी समझ आई, तो लारियोनोव कवियों के अड्डे 'रोज़ोवी फोनार' कैफे में काले रंग से रंगे चेहरे के साथ आ गए। फिर उन्होंने कवि इल्या ज़्दानेविच के साथ एक मैनिफेस्टो लिखा – जिसमें उन्होंने चेहरा रंगने को "आभूषण" कहा।

"हमने ज़ोर से ज़िंदगी को पुकारा, और ज़िंदगी कला में उतर आई। अब कला को ज़िंदगी में उतारने का समय है। चेहरे पर रंग – यही इसकी शुरुआत है।"

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लारियोनोव का मानना था कि पुरुषों को बालों में सुनहरे धागे पिरोने चाहिए, एक मूंछ या आधी दाढ़ी मूंडनी चाहिए, और पैरों पर डिज़ाइन बनाने चाहिए। और महिलाओं को – सीने पर कलर करना चाहिए।

मिखाइल लारियोनोव, "रेडिएंट लैंडस्केप", 1912
Russian museum

मॉस्को के अखबारों ने लिखा कि लारियोनोव अब जनता के चेहरे रंगेंगे। और यह भी कि महिलाएँ उनके पास आकर मॉडल बनने को तैयार थीं – ताकि वह उनके शरीर पर मैनिफेस्टो में बताई गई जगहों पर डिज़ाइन बनाएँ। एक मशहूर रिपोर्ट के अनुसार: "उसकी नेकलाइन और कंधा – दोनों जगह चमकती डिज़ाइन से भरे हुए थे।"

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