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रूस की 5 नई ऐतिहासिक फ़िल्में, जिन्हें मिस नहीं करना चाहिए

Andrey Shalyopa/«28 panfilovtsev» studio, 2026
रूसी ऐतिहासिक सिनेमा में द्वितीय विश्व युद्ध आज भी सबसे बड़ा विषय बना हुआ है। 2026 में निर्देशकों ने मशहूर महिला पायलट लिदिया लित्व्याक और शिकारी मातवेई कुज़मिन जैसे किरदारों की कहानियों को बड़े पर्दे पर उतारा।

1. ‘सेवन वर्स्ट्स बिफोर डॉन’ (2026)

Alexander Andreev/«Reka», 2026

1942 की शुरुआत। प्सकोव क्षेत्र के एक कब्ज़े वाले गांव में जर्मन पर्वतीय सैनिकों की एक टुकड़ी पहुंचती है। उनका मिशन था चुपचाप सोवियत इलाके के पीछे घुसपैठ करना। इसके लिए वे गांव के बुज़ुर्ग शिकारी मातवेई कुज़मिन को रास्ता दिखाने के लिए साथ लेते हैं, क्योंकि उन्हें इलाके के हर छिपे रास्ते की जानकारी होती है। नाज़ियों को लगता है कि बड़ी रकम के बदले वह उनकी मदद करेगा। लेकिन कुज़मिन के मन में कुछ और ही चल रहा था...

यह फ़िल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है। कुज़मिन दुश्मन सैनिकों को सीधे सोवियत घात में ले गए और इस दौरान अपनी जान गंवा बैठे। 1965 में उन्हें मरणोपरांत ‘सोवियत संघ का हीरो’ सम्मान दिया गया। आज मॉस्को मेट्रो के ‘पार्तिज़ान्स्काया’ स्टेशन पर उनकी याद में स्मारक भी मौजूद है।

2. ‘बर्थ ऑफ़ एन एम्पायर’ (2026)

Andrey Kravchuk/«Rossiya 1», Central Partnership, 2026

18वीं सदी की शुरुआत। ज़ार पीटर महान के शासन में रूस, डेनमार्क, सैक्सनी और पोलिश-लिथुआनियाई संघ के साथ मिलकर शक्तिशाली स्वीडन को चुनौती देता है, जो उस दौर में उत्तरी यूरोप पर राज करता था। यह युद्ध रूस से भारी कीमत मांगता है, लेकिन अंत में उसे यूरोप की बड़ी ताकतों की कतार में खड़ा कर देता है।

फ़िल्म के निर्देशक आंद्रेई क्रावचुक ने बताया: “प्योत्र महान मुझे बचपन से आकर्षित करते रहे हैं। हम उनकी ज़िंदगी की नकल नहीं कर रहे, बल्कि कुछ खास घटनाओं के ज़रिए एक जीवंत और कई पहलुओं वाला किरदार बना रहे हैं — जिसमें जीत, हार, प्यार और रोमांच सब कुछ हो।”

3. ‘लित्व्याक’ (2026)

Andrey Shalyopa/«28 panfilovtsev» studio, 2026

तीन घंटे लंबी यह फ़िल्म युवा फाइटर पायलट लिदिया लित्व्याक की कहानी बताती है। उन्होंने दुश्मन के आठ विमानों को मार गिराया था और एक बैलून भी नष्ट किया था। उन्हें साथी सैनिक ‘स्तालिनग्राद की सफेद लिली’ कहते थे। 1943 में सिर्फ 21 साल की उम्र में उनकी मौत हो गई थी। 1990 में उन्हें मरणोपरांत ‘सोवियत संघ का हीरो’ घोषित किया गया।

इस फ़िल्म को बनने में लगभग सात साल लगे। इसका बजट 50 लाख डॉलर से ज़्यादा था, जिसमें 8 लाख डॉलर क्राउडफंडिंग से जुटाए गए थे। निर्देशक आंद्रेई शाल्योपा ने बताया: “जब पैसे कम पड़ने लगे थे, तब लोगों से आने वाली छोटी-छोटी मदद ने हमें संभाले रखा। उसी की वजह से हम फ़िल्म पूरी कर पाए।”

4. ‘एंजेल्स ऑफ़ लादोगा’ (2026)

Alexander Kott/«Rossiya 1», Central Partnership, 2026

8 सितंबर 1941। जर्मन सेना ने लेनिनग्राद को ज़मीन से पूरी तरह घेर लिया था। अब शहर तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता लादोगा झील से होकर जाता था। गर्मियों में जहाज़ों और सर्दियों में जमी हुई झील पर ट्रकों के ज़रिए सामान पहुंचाया जाता था। लेकिन बर्फ पर सिर्फ गाड़ियां ही नहीं चलती थीं — वहां “सफेद पंखों वाले स्काउट” भी थे, यानी बर्फ पर चलने वाली नौकाएं।

1941 में शहर के ‘त्रुद यॉट क्लब’ में ऐसे दो दस्ते बनाए गए थे, जिनमें अनुभवी खिलाड़ी और युवा नाविक शामिल थे। यही फ़िल्म उनकी बहादुरी की कहानी दिखाती है।

5. ‘फादर’ (2026)

Pavel Ivanov/Kinomir, 2026

1942। साइबेरिया का शिकारी गवरिइल को पता चलता है कि उसका बेटा युद्ध के मोर्चे पर लापता हो गया है। उसे भरोसा नहीं होता कि उसका बेटा मर चुका है, इसलिए वह रेड आर्मी में शामिल होकर उसकी तलाश पर निकल पड़ता है। लेकिन रास्ते में उसे एक और जिम्मेदारी मिलती है — युवा स्नाइपर्स को ट्रेनिंग देने की। धीरे-धीरे वह उन सबके लिए एक पिता जैसा बन जाता है।

निर्देशक पावेल इवानोव ने बताया: “मां-बाप का प्यार इंसान की सबसे बड़ी ताकत होता है। माता-पिता और बच्चों का रिश्ता ही हमारी फ़िल्म का दिल है।” अप्रैल 2026 में ‘फादर’ ने 48वें मॉस्को इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में दर्शकों का पुरस्कार भी जीता था।

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