रूसी लोग स्माइली की जगह “)” ब्रैकेट क्यों लगाते हैं?

Natalya Nosova रूस के वेब कम्युनिकेशन कल्चर में स्माइली की जगह ज़्यादातर ब्रैकेट इस्तेमाल होते हैं
Natalya Nosova
रूसी इंटरनेट की दुनिया में ये एक यूनिक और काफ़ी ट्रेंडी आदत है—किसी भी कैज़ुअल मैसेज या वाक्य के अंत में एक ब्रैकेट लगाना। इससे बातचीत में बिना ज़्यादा इमोशनल हुए एक हल्का-सा फ्रेंडली टोन आ जाता है। लेकिन रूस के बाहर के लोग जब इसे देखते हैं, तो अक्सर कन्फ्यूज़ हो जाते हैं।

रूस वैसे भी दुनिया की नज़रों में थोड़ा “मिस्टिरियस” देश है—और वहाँ की छोटी-छोटी आदतें भी काफी अलग होती हैं। हाल ही में एक क्रोएशियाई ट्विटर यूज़र देनिस ने बड़ा स्ट्रेट सवाल पूछा:
“रूसी लोग जो भी लिखते हैं, उसके आखिर में ये ब्रैकेट क्यों लगा देते हैं — ) ?”

बेशक “जो भी” वाला हिस्सा थोड़ा ज़्यादा है। साइंटिफिक रिपोर्ट या किसी ऑफ़िशियल डॉक्यूमेंट में तो आपको ये देखने को नहीं मिलेगा। लेकिन चैट, टेक्स्टिंग और इंटरनेट पर—हाँ, रूस में लोग इसे खूब यूज़ करते हैं। और इसके पीछे वजह भी है।

इतिहास

ब्रैकेट से ही स्माइली की शुरुआत हुई थी। मशहूर रूसी लेखक व्लादिमीर नाबोकोव उन पहले लोगों में थे जिन्होंने महसूस किया कि टेक्स्ट में स्माइल दिखाने के लिए कोई खास निशान होना चाहिए। 1969 में जब उनसे पूछा गया कि वो खुद को इतिहास के बड़े लेखकों की लिस्ट में कहाँ रखते हैं, तो उन्होंने मज़ाकिया अंदाज़ में जवाब दिया:

“कभी-कभी मुझे लगता है कि मुस्कुराहट दिखाने के लिए एक खास टाइपोग्राफिक साइन होना चाहिए—कुछ ऐसा जैसे उल्टा ब्रैकेट।”

काफ़ी फेमिलियर लगता है, है ना? ये वही स्माइली का कांसेप्ट है।

नाबोकोव ने इसे पॉपुलर नहीं बनाया, लेकिन 70 के दशक में टेक्स्ट-स्माइल की आदत शुरू हो गई। और 1982 में कंप्यूटर साइंटिस्ट स्कॉट फाहलमन ने पहली बार यह लिखा:
:-)

बाद में ये :) हो गया।
और रूसियों ने इसे और छोटा कर दिया—कोलन हटाकर सिर्फ एक बंद ब्रैकेट छोड़ दिया: )

‘एक हल्का सा डॉट’

हर रूसी के पास इसे यूज़ करने की अपनी वजह होती है। कुछ कहते हैं “छोटा है, इसलिए आसान है।”
लेकिन बात सिर्फ शॉर्टकट की नहीं है।

“)” एक तरह का फ्रेंडली साइन बन गया है—एक हल्का, पॉज़िटिव टोन, जैसे आप कह रहे हों “मैं नाराज़ नहीं हूँ, मूड अच्छा है, बातचीत आराम से चल रही है।”

TheQuestion.com (Russian Quora) की यूज़र अनास्तासिया वोज़हाकोवा ने इसे “एक तरह का सभ्य डॉट” कहा। उनका मतलब था कि अगर कोई व्यक्ति कैज़ुअल चैट में ब्रैकेट नहीं लगाता, तो सामने वाले को लगेगा कि शायद उसका मूड ऑफ है या वो थोड़ा रूड लग रहा है।

इमोजी उनके हिसाब से बहुत ज़्यादा इमोशनल होते हैं—इसलिए ब्रैकेट ज्यादा “कूल” और नॉर्मल माना जाता है।

गलतफ़हमियाँ

रूस में लोग इतने आदतन “)” लिखते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि दूसरे देशों के लोग इसे समझ नहीं पाते। कई लोग तो इसे देखकर सोचते हैं “ये आखिर है क्या?”

BBC के एडमंड हैरिस ने 2010 में लिखा:
“मेरा रूसी दोस्त मुझे ऐसे मैसेज करता था: ‘रास्ते में हो तो एक मार्लबोरो और बीयर ले आना )।’ इसके स्माइली में न आंखें हैं, न नाक! मैं इसे कैसे समझूँ?”

अब उसे जवाब दिया जा सकता है:
कुछ मत समझो, बस बीयर ले आओ!
क्योंकि वो “)” कोई खास मतलब बताता नहीं, बस बातचीत को हल्का और फ्रेंडली बना देता है।

ब्रैकेट का एटीकेट (हाँ, ये भी होता है)

  • “)” = नॉर्मल, फ्रेंडली टोन

  • “))” = सामने वाला सच में कुछ मज़ेदार मान रहा है

  • “)))” = वो हँस रहा है (LOL लेवल)

  • “))))))))” = ओवरडूइंग — इंटरनेट कल्चर वाले लोग आमतौर पर इतना नहीं डालते

लेकिन चाहे ब्रैकेट हों, स्माइली हों या इमोजी—ओवरयूज़ हमेशा थोड़ा अजीब लगता है।

कॉनटेम्पररी रूसी लेखक विक्टर पेलेविन ने तो स्माइलीज़ को “विज़ुअल डियोडरेंट” कहा है।
उनका कहना था कि लोग स्माइली इसलिए लगाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात “अच्छी नहीं महक रही”, तो वे उसे अच्छी सुगंध देने के लिए स्माइली लगा देते हैं। सही कंपैरिजन है, है ना? )