रूस की जातीय समूह: ओरोक लोग
यह तुंगस-मांचू समूह रूस के सबसे छोटे समुदायों में से एक है। इनकी संख्या 300 से भी कम है, जिनमें से अधिकांश सखालिन द्वीप पर रहते हैं। ओरोक लोग अपनी जातीय समूह के लिए 20 से अधिक नाम रखते हैं, लेकिन वे खुद को 'उल्ता' कहना पसंद करते हैं।
ओरोक लोग दो समूहों में बँटे हैं – उत्तरी ओरोक ('दोरोनेन') और दक्षिणी ओरोक ('सुन्नेन')। बारहसिंगा (रेनडियर) पालना हमेशा से पहले उत्तरी समूह का मुख्य काम रहा है। इन लोगों का नाम भी शब्द 'ओरोन' (पालतू बारहसिंगा) से आया है। वहीं, दक्षिणी ओरोक मछली पकड़ने और शिकार में लगे रहते थे।
19वीं सदी के अंत में ईसाई धर्म (ऑर्थोडॉक्स) अपनाने से पहले, ओरोक लोग पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं को मानते थे। वे आत्माओं को फल, सब्जियां, सूअर, मुर्गा और कुत्ते की बलि देकर खुश करते थे और उनका सम्मान करते थे। उनकी सबसे पूजनीय आत्माओं में 'डोंटो' (भालुओं का स्वामी और जंगल का रक्षक) और 'टेओमु' (किलर व्हेल – समुद्र का शासक) थे।
ओरोक लोग मछली को कच्चा, सूखा, जमा हुआ, उबला, स्मोक्ड और नमकीन – कई तरह से खाते हैं। वे मछली से सूप और पेस्ट भी बनाते हैं। उनके खाने में बारहसिंगा और सील का मांस भी शामिल है। प्राचीन काल में, शिकार पर जाने से पहले, ओरोक लोग उबला हुआ कुत्ते का मांस खाते थे। उनका मानना था कि इससे उन्हें कुत्ते की सूंघने की शक्ति और स्टैमिना मिलता है।