पुराने रूस में लोक चिकित्सा कैसी थी?
पुराने रूस की चिकित्सा-संबंधी एनसाइक्लोपीडिया
इतिहासकार पुराने मेडिकल मैनुअल, हर्बल मैनुअल, इतिहास और संतों के जीवन से लोक उपचार के तरीकों के बारे में सीखते हैं। इन स्रोतों में इलाज के तरह-तरह के तरीके बताए गए हैं — वैद्य अल्सर और त्वचा रोग ठीक करते थे, तीर निकालते थे और छोटी-छोटी सर्जरी भी करते थे। बीमारी से बचने के लिए, गांव वाले अपने शरीर पर चाकू, चम्मच या जानवरों की मूर्तियों के रूप में "जादुई" सुरक्षा वाले ताबीज़ पहनते थे।
स्वास्थ्य को लेकर अंधविश्वास सदियों तक चलते रहे। एथ्नोग्राफर्स ने पाया कि 19वीं सदी में भी, जब चिकित्सा विज्ञान काफी आगे बढ़ चुका था, गाँवों में लोग बीमारी को पापों की सज़ा मानते थे।
किसान बीमार क्यों पड़ते थे
19वीं सदी के आखिर में, डॉक्टर गवरिल पोपोव ने पारंपरिक इलाज के तरीकों का अध्ययन करना शुरू किया। उन्होंने 'रशियन फोक एंड डोमेस्टिक मेडिसिन' नाम की एक किताब लिखी, जिसमें रूस के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले इलाज के बारे में बताया।
पोपोव ने लिखा कि किसान अक्सर बीमारी की वजह को उसके असली कारणों से नहीं जोड़ पाते थे: लोग अपने घरों और हवा की सफ़ाई पर ध्यान नहीं देते थे, न ही खाने-पानी की गुणवत्ता पर, बल्कि बीमारी को एक जीवित प्राणी मान लेते थे। गाँव वाले अपनी बीमारियों के असली कारणों को कोई महत्व नहीं देते थे, बल्कि उनके लिए तरह-तरह की अलौकिक व्याख्याएँ ढूँढ़ लेते थे।
बुखार के बारे में लोग क्या सोचते थे
लोक मान्यता में बुखार को 12 औरतों के रूप में देखा जाता था, जिनमें से हर एक की अपनी अलग खासियत थी: एक नींद न आने की बीमारी का कारण बनती थी, दूसरी भूख कम कर देती थी, तीसरी खून खराब कर देती थी और नसों को खींचती थी। आम मान्यता के अनुसार, गंभीर संक्रामक बीमारियों की महामारी भगवान ने पापों की सज़ा के तौर पर भेजी थी। इसलिए, लोगों का मानना था कि डॉक्टर और दवाएँ किसी काम नहीं आएंगी।
कुछ इलाकों में, बीमारियों को जानवरों की शक्ल से जोड़ा जाता था: — चेचक को मेंढक, बुखार को तितली, और खसरे को हेजहॉग की तरह। पेट में दर्द हो तो लगता था कि अंदर साँप या मेंढक घुस गया है। शराब के आदी लोगों के बारे में यह कहा जाता था कि उनकी वोदका में शैतान ने एक छोटा सा कीड़ा डाल दिया था।
रोज़मर्रा की चोटों को शैतान की करतूत माना जाता था — वह घोड़ा बनकर पैर कुचल देता था, किसी को धक्का देकर हाथ तोड़ देता था, या काम के दौरान कुल्हाड़ी से जख्मी कर देता था। इसी तरह, 'क्लिकुशेस्तवो' (हिस्टीरिया के दौरे), पागलपन और मिर्गी को भी शैतान की करतूत माना जाता था।
बचाव के जादुई उपाय
पुराने ज़माने में गाँवों में लोग डॉक्टरों और दवाइयों पर भरोसा नहीं करते थे। हर घर में अपने-अपने "घरेलू" नुस्खे होते थे: बीमार व्यक्ति को पेट के बल गर्म चूल्हे पर लिटाया जाता था और उसके शरीर पर तरह-तरह की चीज़ें — तारकोल, चर्बी या सहिजन — मली जाती थीं। और अगर इन नुस्खों से आराम न आए, तो 'ज़्नाखार' (ओझा-वैद्य) को बुलाया जाता था।
पुराने ज़माने में बान्या (स्नानगृह) को सबसे बड़ा और कारगर इलाज माना जाता था। जब भी किसी को बुखार आता या लगता कि किसी की नज़र लग गई है, तो बच्चों और बड़ों को वहाँ स्टीम बाथ करने ले जाया जाता था।
जादुई इलाज के तरीके भी बहुत आम थे। ट्यूमर या चमड़ी के रोग पर कोयले या चाकू से एक गोला बना दिया जाता था — एक जादुई घेरा बनाकर शरीर के स्वस्थ हिस्सों को बीमारी से बचाने की कोशिश की जाती थी।
मानसिक बीमारियों का इलाज पादरियों को सौंपा गया था। चर्चों और मठों में, “भूत-प्रेत से ग्रसित” लोगों के लिए खास प्रार्थनाएँ की जाती थीं और उन्हें चमत्कारी आइकनों के सामने पेश किया जाता था।