रूस का पहला ट्रैवलॉग: अफानासी निकितिन की 'तीन समुद्र पार यात्रा'

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1468 में, वह त्वेर से वोल्गा नदी के रास्ते कैस्पियन सागर की ओर जहाजों के एक काफिले के साथ रवाना हुए। उनका यह सफर इतना लंबा था कि कई सालों तक चला और कई देशों से होकर गुज़रा।

अफानासी निकितिन 15वीं सदी के एक रूसी व्यापारी थे। उनके बारे में लगभग कुछ भी मालूम नहीं, सिर्फ इतना कि वह निकिता के बेटे थे ('निकितिन' उनका सरनेम नहीं, बल्कि उपनाम  था) और वह त्वेर में रहते थे। उनकी विशाल यात्रा एक व्यापारिक अभियान से शुरू हुई। मगर जब अस्त्रखान के पास डाकुओं ने उनके काफिले को लूटा, तो उन्होंने हार नहीं मानी और नुकसान की भरपाई के लिए आगे ही बढ़ते रहे। दरबंद और फारस के रास्ते वह होरमुज़ पहुंचे, फिर अरब सागर को पार कर भारत के चौल बंदरगाह पर उतरे।

उन्होंने भारत में करीब तीन साल बिताए, जहाँ उन्होंने वहाँ के राजघरानों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी, व्यापार, धार्मिक रस्मों और राजनीतिक ढांचे को देखा। उनके लिखे नोट्स खास हैं, क्योंकि ये पुराने रूस में किसी दूर-दराज के इलाकों के बारे में पहला सेक्युलर ब्यौरा हैं, जिनमें कोई मिथक नहीं है। उन्होंने कीमतें, चीज़ें, रीति-रिवाज़ और अपने अनुभवों को लिखा, जैसे कि घर की याद और हिंदुओं-मुसलमानों के बीच अपने ईसाई धर्म पर सोच-विचार।

उनके लिखे नोट्स का नाम है, 'तीन समुद्र पार यात्रा'। ये तीन समुद्र थे — कैस्पियन, अरब और काला सागर (यह उन्होंने वापसी में पार किया)। उनका रास्ता बहुत पेचीदा था। वे बहमनी सल्तनत, उसकी राजधानी बीदर, मशहूर विजयनगर और धार्मिक शहर परबत्ता गए। वापसी में उन्होंने अरब, फारस और ट्रेबिज़ोंड का रास्ता लिया, लेकिन वे अपने घर त्वेर नहीं पहुँच पाए। 1475 की पतझड़ में स्मोलेंस्क के पास उनका देहांत हो गया।

उनके साथियों ने उनके नोट्स  को मॉस्को पहुँचाया, जहाँ उन्हें इतिहास-वृत्तांत में शामिल कर लिया गया।

Tselik / Sputnik अफानासी निकितिन की 'तीन समुद्र पार यात्रा', 16वीं सदी की हस्तलिखित मैन्युस्क्रिप्ट का एक पेज (रिप्रोडक्शन)।
Tselik / Sputnik

अपने समय के हिसाब से, ‘द जर्नी’ (तीन समुद्र पार यात्रा) कई वजहों से एक बड़ी कामयाबी थी। पहली बात, यह एक धर्मनिरपेक्ष यात्रा-वृत्तांत है। पुराने रूसी साहित्य में निकितिन से पहले भी "यात्रा-वृत्तांत" की शैली मौजूद थी, लेकिन सभी उदाहरण तीर्थयात्रा के वर्णन थे, जो मुख्य रूप से यरुशलम जैसे पवित्र स्थलों की यात्राओं के बारे में थे। दूसरी ओर, निकितिन व्यापार, दाम, सड़कों और राजनीतिक हालात के बारे में लिखते हैं। यह एक प्रैक्टिकल ब्यौरा है, न कि आध्यात्मिक शिक्षा।

दूसरी बात, भारत का यथार्थवादी दृष्टिकोण। निकितिन से पहले, भारत के बारे में मनगढ़ंत कहानियाँ – जैसे कुत्ते के सिर वाले लोग और ऐसी ही दूसरी कहानियाँ – रूस और यूरोप में फैली हुई थीं। लेकिन, निकितिन ने असली देश को देखा: उन्होंने चावल और सब्ज़ियाँ खाते किसानों, कारीगरी करने वाले शहर के लोगों, हाथी और युद्ध के घोड़ों पर सवार राजकुमारों के बारे में बताया, जिनकी कीमत सोने से भी ज़्यादा थी। उन्होंने विस्तार  से लिखा कि कौन सा सामान आयात-निर्यात होता है, कहाँ क्या खरीदा जा सकता है और कौन-सी स्थानीय मुद्राएँ चलन में हैं। उनका दृष्टिकोण एक चौकस व्यापारी वाला था।

तीसरा, एक सच्चा आंतरिक संवाद। पूरी किताब में, निकितिन आस्था के बारे में सोचते हैं। खुद को मुसलमानों और हिंदुओं से घिरा हुआ पाकर, वह एक ईसाई के तौर पर अपने अकेलेपन को बहुत महसूस करते हैं। वह हिंदू रीति-रिवाजों (व्रत, नहाना, सूर्य पूजा) के बारे में सम्मान से ज़िक्र करते हैं, पर उन्हें इस बात का दुख भी होता है कि वह ऑर्थोडॉक्स रीति-रिवाजों नहीं कर पाते।

'तीन समुद्र पार यात्रा' वास्को द गामा की यात्रा से 30 साल पहले लिखी गई थी और यूरोपीय लोगों द्वारा भारत के बारे में बताए गए विवरणों से कई दशक पहले की है। 15वीं सदी के रूसी रीडर्स के लिए, यह एक पूरी तरह से अनजान दुनिया की खिड़की थी। आज के इतिहासकारों के लिए, यह एक अमूल्य दस्तावेज़ है।

रूसी इतिहासकारों ने 19वीं सदी की शुरुआत तक निकितिन के नोट्स (जो क्रॉनिकल मैन्युस्क्रिप्ट्स में थे) नहीं पढ़े थे। 1817 में, करमज़िन ने अपनी किताब 'हिस्ट्री ऑफ द रशियन स्टेट' में गर्व से लिखा: "अब तक, भूगोलवेत्ताओं को यह नहीं पता था कि यूरोपीय स्रोतों में वर्णित भारत की सबसे पुरानी यूरोपीय यात्राओं में से एक का सम्मान ज़ार इवान के शासनकाल में रूस को जाता है… ऐसे समय में जब वास्को द गामा पूरी तरह से अफ्रीका से हिंदुस्तान तक का रास्ता खोजने की संभावना में व्यस्त था, हमारा त्वेर का आदमी पहले से मालाबार तट पर व्यापार कर रहा था और स्थानीय लोगों के साथ उनके धर्म के सिद्धांतों के बारे में बात कर रहा था।"

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