सोवियत संघ ने बंदरों की जगह कुत्तों को ही क्यों भेजा अंतरिक्ष में?

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सोवियत संघ में बंदरों को भी अंतरिक्ष में भेजने पर विचार किया गया था।

जानवरों को अंतरिक्ष में भेजने के प्रयोग सोवियत संघ और अमेरिका, दोनों में एक ही समय पर, 1940 के दशक में शुरू हुए।

कई मायनों में बंदरों को इंसानों के ज्यादा करीब माना जाता था। इसी वजह से अमेरिका ने उन्हें चुना। 1948 में ‘अल्बर्ट’ नाम का एक रीसस मकाक बंदर रॉकेट से अंतरिक्ष में जाने वाला पहला बंदर बना।

सोवियत संघ में बंदरों पर भी विचार किया गया था। अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक, डॉक्टर ओलेग गजेन्को, ने बंदरों को करीब से देखने के लिए एक सर्कस का दौरा तक किया। वहीं उन्हें समझ आया कि बंदर काफी मुश्किल साबित हो सकते हैं। वे भावनात्मक रूप से कम स्थिर होते हैं और घबराहट या तनाव में आकर आक्रामक भी हो सकते हैं।

अमेरिका में इस समस्या से निपटने के लिए बंदरों को दवाओं के असर में रखकर अंतरिक्ष में भेजा जाता था। वहीं, सोवियत संघ ने कुत्तों को चुना। और खास तौर पर आवारा कुत्तों को।

गजेन्को ने समझाया, “यह बात आसानी से समझी जा सकती है। आवारा कुत्ते बेहद समझदार होते हैं और ज्यादा नखरे नहीं करते। किसी भी नस्ल के कुत्ते की तुलना में, वे अपने साथ किए गए प्यार और अच्छे व्यवहार की ज्यादा कद्र करते हैं।”

सोवियत संघ ने कुल 51 आवारा कुत्तों को रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा। इनमें से 12 की इस यात्रा के दौरान मौत हो गई।

बंदरों की बारी बहुत बाद में आई। 1980 के दशक में सोवियत ‘बायोन’ कार्यक्रम के तहत 12 बंदरों को अंतरिक्ष में भेजा गया। लेकिन जब लैंडिंग के बाद आखिरी बंदर ‘मुल्तिक’ की मौत हो गई, तो कार्यक्रम को बंद करने का फैसला किया गया।

 

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