रूसी क्लासिक साहित्य से 7 सबसे रहस्यमय किताबें
1. निकोलाई गोगोल — दीकांका के पास एक खेत में शामें (1829–1831)
गोगोल को रूसी रहस्यमई साहित्य का अग्रदूत माना जाता है। 1831 में उन्होंने ऐसा रंगीन और कल्पनाशील संग्रह लिखा जिसने पूरे सेंट पीटर्सबर्ग समाज को चौंका दिया। गोगोल यूक्रेन (तब "मालोरूसिया" कहा जाता था) से थे और उन्होंने इस किताब की कहानियाँ एक यूक्रेनी गाँव के जीवन पर आधारित की थीं। पात्र साधारण किसान, मज़दूर और कोसैक थे।
इस संग्रह में मज़ेदार हास्य कथाओं के साथ-साथ गहरी रहस्यमयी कहानियाँ भी हैं। उदाहरण के लिए, सबसे प्रसिद्ध कहानी क्रिसमस की पूर्वसंध्या में एक शैतान का किरदार है – मज़ाकिया और कुछ हद तक हानिरहित, जो नायक की प्रेमिका का दिल जीतने में मदद करता है।
लेकिन दूसरी कहानियाँ जैसे मई की रात, भयानक प्रतिशोध कहीं अधिक डरावनी हैं, जिनमें चुड़ैलें, जादूगर और पानी में डूब चुकी औरतें हैं जो बाहर आकर लोगों को खींच ले जाती हैं।
2. निकोलाई गोगोल — वीय (1833)
वीय गोगोल के मिर्गोरोड संग्रह की चार कहानियों में से एक है और इसे पहला रूसी हॉरर माना जाता है। बाकी कहानियाँ यथार्थवादी हैं (जैसे प्रसिद्ध तारास बुल्बा), लेकिन वीय पूरी तरह डरावनी है। इसमें आत्माओं और अलौकिक शक्तियों का इतना सजीव चित्रण है कि इस पर कई फिल्में बनी हैं।
कहानी में कीव की थियोलॉजिकल अकादमी का एक छात्र एक दूरस्थ यूक्रेनी गाँव जाता है, ताकि एक धनी व्यक्ति की मृत बेटी की अंतिम प्रार्थनाएँ पढ़ सके। रातभर उसे अकेले चर्च में शव के साथ रहना पड़ता है। आगे जो घटता है, वह शब्दों से परे है – बेहतर है कि इसे गोगोल की कलम से ही पढ़ा जाए। संवेदनशील लोग इसे रात में न पढ़ें।
3. निकोलाई गोगोल — पोर्ट्रेट (1833–1834)
दीकांका की शामें और मिर्गोरोद के बाद गोगोल ने राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में रहते हुए शहर पर आधारित कहानियाँ लिखीं। इनमें भी रहस्य है, लेकिन यहाँ ग्रामीण लोककथाओं वाले राक्षस या चुड़ैलें नहीं, बल्कि शहरी जीवन से जुड़ी अलौकिक शक्तियाँ हैं।
उदाहरण के लिए, नाक नामक कहानी में एक मेजर सुबह उठता है तो पाता है कि उसकी नाक गायब है और वह नाक शहर में अलग से घूम रही है!
लेकिन सबसे गहरी और भयावह कहानी है पोर्ट्रेट। इसमें एक गरीब चित्रकार अपनी आखिरी रकम खर्च कर एक बूढ़े आदमी का चित्र खरीदता है। चित्र उसे इतना जीवंत लगता है जैसे वह आदमी ज़िंदा हो। सपने में वही बूढ़ा चित्र से बाहर निकलता है और उसे पैसों का बंडल देता है – और सुबह सचमुच चित्र के पास वह पैसा रखा होता है।
इसके बाद चित्रकार मशहूर हो जाता है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी प्रतिभा खत्म हो जाती है। अंततः वह पागल होकर मर जाता है। बाद में पता चलता है कि यह चित्र एक साहूकार का था और उसने पहले भी कई लोगों का सर्वनाश किया था।
4. इवान तुर्गनेव — बेझिन का मैदान (1852)
यह मान लेना सही नहीं होगा कि सिर्फ़ गोगोल ही रहस्यवादी विषयों में रुचि रखते थे। रूसी यथार्थवादी लेखकों में से एक प्रमुख नाम, इवान तुर्गनेव, ने भी रहस्यमयी कथाओं को अपने साहित्य में जगह दी। उनकी प्रसिद्ध किताब एक शिकारी की डायरी (Sketches from a Hunter’s Album) में ऐसी ही एक कहानी है।
कथावाचक जुलाई की एक धूपभरी सुबह शिकार पर निकलता है। मौसम एकदम साफ़ होता है, लेकिन अचानक वह घने अंधेरे जंगल में पहुँच जाता है। उसे रास्ता समझ नहीं आता और वह देर शाम तक भटकता रहता है। थककर वह कुछ किसान लड़कों के पास पहुँचता है, जो अपने घोड़ों को चराते हुए अलाव के पास बैठे होते हैं।
वह उनके साथ बैठकर आराम करता है और उनकी कहानियाँ सुनता है — जिनमें घर के आत्मा, जंगल के भूत-प्रेत और अजीब घटनाएँ शामिल होती हैं। ये किस्से इतने डरावने होते हैं कि पाठक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
5. फ़्योदोर दोस्तोएव्स्की — बोबोक (1873)
"नए गोगोल" कहे जाने वाले दोस्तोएव्स्की ने अक्सर रहस्य और अलौकिक विषयों को अपनी रचनाओं में शामिल किया। लेकिन उनके यहाँ यह अक्सर पागलपन, भ्रम और मतिभ्रम से जुड़ा होता है।
कहानी का नायक एक शराबी पत्रकार है, जो नशे में धुत होकर एक अंतिम संस्कार में पहुँचता है। कब्रिस्तान में ही वह एक कब्र के ऊपर सो जाता है। नींद में उसे मृतकों की आवाज़ें सुनाई देती हैं। जागने पर भी यह भ्रम जारी रहता है और वह उनकी बातचीत साफ़-साफ़ सुन पाता है। बीच-बीच में उसे अजीब बड़बड़ाहट जैसी ध्वनियाँ भी सुनाई देती हैं — “बोबोक, बोबोक, बोबोक…”
कहा जाता है कि इस कहानी की प्रेरणा दोस्तोएव्स्की को उस समय मिली जब एक आलोचक ने उनकी तस्वीर देखकर उन्हें मानसिक रोगी कह दिया था। शायद यही वजह थी कि उन्होंने पागलपन को कहानी का मुख्य विषय बनाया और उसे अतिशयोक्ति तक पहुँचा दिया।
6. अंतोन चेख़व — काला सन्यासी (1893)
यथार्थवादी लघुकथाओं के महारथी चेख़व ने इस कहानी में अपने पाठकों को वास्तविक और रहस्यमयी, सच और भ्रम की सीमा तक पहुँचा दिया।
कहानी एक दार्शनिक कोवरिन के बारे में है, जिसकी मानसिक स्थिति कमजोर है। उसने काले सन्यासी की आत्मा के बारे में किस्से सुने होते हैं, और एक दिन वह वास्तव में उसे देखता है। धीरे-धीरे वह उसी के साथ बातचीत करने लगता है। उसकी मंगेतर तान्या मानती है कि कोवरिन बीमार है और उसे इलाज की ज़रूरत है, लेकिन वह मानने को तैयार नहीं होता।
चेख़व का कहना था कि कोवरिन "महानता के भ्रम" (delusions of grandeur) से ग्रस्त था, जो अंततः पागलपन में बदल गया। यह कहानी इतनी रहस्यमयी है कि चेख़व के समकालीन भी उसके सही अर्थ और लेखक की मंशा को लेकर उलझे रहे।
7. मिखाइल बुल्गाकोव — मास्टर और मार्गरीटा (1928–1940)
रूसी साहित्य का सबसे रहस्यमयी उपन्यास मास्टर और मार्गरीटा लंबे समय तक सोवियत संघ में प्रतिबंधित रहा। बुल्गाकोव का इरादा ईश्वर और शैतान पर आधारित रचना लिखने का था।
उपन्यास में दो कथानक समानांतर चलते हैं। पहले में शैतान और उसका दल मास्को (सोवियत राजधानी) में आता है और हाहाकार मच जाता है। शैतान मार्गरीटा को समझौता प्रस्ताव देता है — अगर वह चुड़ैल बनकर शैतान के बॉल की मालकिन बनेगी, तो वह उसके प्रिय मास्टर (एक लेखक) की अधूरी किताब पूरी करने में मदद करेगा।
दूसरे कथानक में यूदिया के प्रांतपाल पोंतियस पिलात उस उपदेशक येशुआ हा-नोत्सरी (जिसका आधार ईसा मसीह माने जाते हैं) को गिरफ्तार कर फांसी दिलवा देता है।
इस उपन्यास की रहस्यमय शक्ति इतनी गहरी है कि इसका असर लेखक की ज़िंदगी पर भी पड़ा। बुल्गाकोव ने इस किताब पर 10 से अधिक साल काम किया, कई बार दोबारा लिखा और अंतहीन संशोधन किए। काम करते-करते उनकी तबियत बिगड़ गई और वे नशे की दवाओं के सहारे जीने लगे। आख़िरी संपादन उन्होंने अपनी पत्नी को बोलकर लिखवाया। 1940 में उनकी मृत्यु हो गई और किताब अधूरी रह गई। यह पहली बार लेखक की मौत के 16 साल बाद प्रकाशित हुई।
यहां तक कि इस पर बनी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों पर भी अजीब घटनाएँ हुईं। व्लादिमीर बॉर्त्को की टीवी सीरीज़ में शैतान का किरदार निभा रहे अभिनेता ओलेग बासिलाशविली अचानक अपना स्वर खो बैठे और लंबे समय तक ठीक नहीं हुए। और अजीब संयोग यह हुआ कि शो के प्रसारण के पाँच साल के भीतर इसमें काम करने वाले 13 कलाकारों की मौत हो गई!