गिलहरी की तरह चक्कर काटना — इस मुहावरे का क्या अर्थ है?
जो लोग लगातार कामों में उलझे रहते हैं और बहुत भाग-दौड़ करते हैं, उनके बारे में कहा जाता है कि वे गिलहरी की तरह चक्कर काट रहे हैं
रूसी साहित्य में यह मुहावरा इवान क्रायलोव की बदौलत आया। 1833 में उन्होंने 'बेल्का' (गिलहरी) नाम की एक कविता लिखी। उसकी नायिका दिन-भर एक पहिए में दौड़ती रहती थी, और कहती थी कि उसे न पीने का, न खाने का, न ही साँस लेने का वक्त है। लेकिन वह एक ही जगह पर भागती रहती थी।
“вертеться, как белка в колесе” (वेर्तेत्स्या काक बेल्का व कोलेसे) यानी पहिये में गिलहरी की तरह भागना को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी इस्तेमाल किया जाने लगा, जब किसी की ज़िंदगी बेकार की भाग-दौड़ में बर्बाद हो रही हो, तो इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता था।