रूसी सम्राटों के दौर में ‘आराप’ क्या काम करते थे?
पहले ‘आराप’ या ‘आरापचाता’ (तुर्की में अरब लोगों या अरब प्रायद्वीप से आए लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द, जिसका मतलब अक्सर बच्चों और किशोरों के लिए होता था) 17वीं सदी में मॉस्को में दिखाई दिए। ज़्यादातर वे पूर्वी देशों के दूतों या यूरोपीय राजनयिकों के “अनोखे तोहफे” होते थे, जो ज़ार (सम्राट) को प्रभावित करना चाहते थे। लेकिन रूस के साम्राज्य बनने के बाद हालात बदल गए। पीटर महान, जो रूस को यूरोप की सांस्कृतिक दुनिया का हिस्सा बनाना चाहते थे, उन्होंने यूरोपीय राजशाहियों की कई परंपराएं अपनाईं। ‘ब्लैक पेज’ भी उनमें से एक थे। पीटर ने विदेशी कलाकारों — जैसे आद्रिआन स्कोनबेक — को ऐसे चित्र बनाने का आदेश दिया, जिनमें ज़ार के साथ एक अश्वेत लड़का दिखाया गया हो। ये तस्वीरें धीरे-धीरे प्रतिष्ठा की पहचान बन गईं। कुछ ही समय में ऊंचे वर्ग के लोगों के बीच अपने “अश्वेत लड़के” का होना — चाहे असल ज़िंदगी में या सिर्फ तस्वीरों में — फैशन बन गया। इसे शाही परिवार के करीब होने, दौलत और पश्चिमी तौर-तरीकों से परिचय की निशानी माना जाता था। महारानी कैथरीन प्रथम, एलिज़ावेता पेत्रोव्ना और बाद में सम्राट बने पावेल प्रथम की आधिकारिक तस्वीरों में भी उनके साथ अश्वेत सेवक दिखाई देते हैं। महारानी अन्ना इयोआन्नोव्ना की एक मूर्ति भी है, जिसमें एक अश्वेत लड़का उन्हें शाही राजदंड और गोला पेश करता दिखाया गया है।
दरबार में ‘आराप’ का दर्जा काफी ऊंचा माना जाता था। वे सिर्फ सजावट का हिस्सा नहीं थे, बल्कि आधिकारिक कर्मचारी होते थे। उन्हें सरकारी पद, तय वेतन और रैंक दी जाती थी। उनकी सालाना तनख्वाह 600 से 800 रूबल तक हो सकती थी — जो उस दौर में काफी बड़ी रकम मानी जाती थी।
उनके कपड़े भी किसी कला के नमूने से कम नहीं होते थे — लाल या नीले रंग की ढीली पैंट, सोने की कढ़ाई वाली जैकेट, बर्फ जैसी सफेद पगड़ी जिन पर शुतुरमुर्ग के पंख लगे होते थे या फिर खास ईस्टर्न हैट।
आराप सम्राट के साथ समारोहों में जाते, दरवाज़े खोलते और शाही नकाबपोश आयोजनों में हिस्सा लेते थे। दरबार में सेवा करने के लिए एक जरूरी शर्त थी — ऑर्थोडॉक्स ईसाई धर्म अपनाना।
इस परंपरा की सबसे मशहूर मिसाल अब्राम पेत्रोविच हनिबाल की कहानी है, जिन्हें ‘पीटर दी ग्रेट का आराप’ कहा जाता था।
उन्होंने बेहतरीन शिक्षा हासिल की, सैन्य इंजीनियर के तौर पर बड़ी कामयाबी पाई और जनरल के पद तक पहुंचे। उन्होंने यह सोच पूरी तरह बदल दी कि दरबार के आराप सिर्फ दिखावे के लिए होते थे।
उनकी कहानी बाद में एक दास्तान बन गई और उनके परपोते कवि अलेक्सांद्र पुश्किन ने इसे हमेशा के लिए अमर कर दिया।