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दोनों पैर कटने के बाद भी इस पायलट ने उड़ान भरी!

Gateway to Russia (Photo: Pavel Voznesensky/TASS; Illustration: Created by Google Gemini)
सोवियत दौर में अलेक्सेई मारेस्येव का नाम हर स्कूली बच्चे को पता था। और उनकी हैरतअंगेज़ बहादुरी को बोरिस पोलेवोय की किताब ‘एक असली इंसान की कहानी’ में हमेशा के लिए अमर कर दिया गया।

5 अप्रैल 1942 में उत्तर-पश्चिमी रूस — नोवगोरोद क्षेत्र। सीनियर लेफ्टिनेंट अलेक्सेई मारेस्येव अपने फाइटर विमान से उड़ान भरते हैं, ताकि दुश्मन के एयरफील्ड पर हमला करने जा रहे बॉम्बर्स को सुरक्षा दे सकें। उनका काम सिर्फ हमलावर विमानों को कवर देना था, लेकिन तभी उन्हें एक आसान निशाना दिखा और उन्होंने खुद एक नाज़ी विमान पर हमला करने का फैसला कर लिया। फिर दूसरे पर भी…

उन्होंने अपना पूरा गोला-बारूद इस्तेमाल कर दिया, लेकिन तभी उनका विमान भी निशाना बन गया। पाइन के पेड़ों ने टक्कर का असर कुछ कम कर दिया, इसलिए पायलट की जान बच गई।

जब उन्हें होश आया, तो एक भालू उन्हें सूंघ रहा था और अपने पंजों से उनकी यूनिफॉर्म फाड़ रहा था। लेकिन मारेस्येव ने किसी तरह अपना रिवॉल्वर निकाला और पूरी गोली भालू पर दाग दी। इस तरह उनकी जान दूसरी बार बची।

आत्मबल की मिसाल

अलेक्सेई को समझ आ गया था कि उनके पैर बुरी तरह घायल हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद वे खड़े हो गए। ज़बरदस्त हिम्मत जुटाकर उन्होंने पेड़ों का सहारा लेते हुए चलना शुरू किया। दूर से तोपों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उन्हें समझ आ गया कि वहीं लाल सेना की पोज़िशन है और उन्हें उसी दिशा में बढ़ना होगा। बाद में पता चला कि उनके पैरों की लगभग सारी हड्डियां टूट चुकी थीं…

‘एक असली मर्द की कहानी’ फिल्म का एक दृश्य / Sputnik

वे लंगड़ाते हुए चलते, गिरते, थोड़ा आराम करते और फिर आगे बढ़ते। भूख और ठंड उन्हें लगातार तोड़ रही थी। हालत इतनी खराब हो गई कि जंगल में मिले एक कांटेदार जंगली जीव को भी उन्हें खाना पड़ा।

जब चलने की ताकत खत्म हो गई, तो वे घिसटते हुए आगे बढ़ने लगे। और जब शरीर पूरी तरह जवाब दे गया, तो वे ज़मीन पर लुढ़कते हुए आगे बढ़ते रहे।

उनका बचना चमत्कार से कम नहीं

घनी दाढ़ी, मिट्टी से सना चेहरा और बेहद कमजोर हालत में उन्हें गांव के बच्चों ने देखा। घायल पायलट को स्लेज पर लादकर गांव लाया गया, जहां कई दिनों तक वे बेहोश पड़े रहे और गांव वाले उनकी देखभाल करते रहे।

के. माक्सिमोव द्वारा बनाया गया अलेक्सेई मारेस्येव का चित्र। त्रेत्याकोव गैलरी के संग्रह से।
Vladimir Vdovin / Sputnik

मई में उनके स्क्वाड्रन कमांडर गांव पहुंचे। तारीखों का हिसाब मिलाने पर पता चला कि मारेस्येव ने जंगल में 18 दिन बिताए थे। आज जिस जगह वे मिले थे, वहां एक स्मारक चिन्ह लगाया गया है। कमांडर उन्हें एयरफील्ड लेकर गए, जहां से उन्हें सैन्य अस्पताल भेजा गया।

अंत या नई शुरुआत?

अस्पताल में पता चला कि मारेस्येव को गैंग्रीन और खून में संक्रमण हो चुका था। किस्मत से एक मशहूर प्रोफेसर ने उनका ऑपरेशन किया और उनकी जान बचा ली। हालांकि, घुटनों के नीचे से उनके दोनों पैर काटने पड़े।

मारेस्येव गहरे अवसाद में चले गए। उन्हें लगने लगा कि अब वे कभी उड़ान नहीं भर पाएंगे। लेकिन अस्पताल में उनकी मुलाकात एक कमिसार से हुई, जिसने उनका हौसला बढ़ाया। उसने उन्हें प्रथम विश्व युद्ध के एक ऐसे पायलट की कहानी पढ़ने को दी, जिसने एक पैर खोने के बावजूद दोबारा उड़ान भरी थी। यही कहानी मारेस्येव के लिए प्रेरणा बन गई और उन्होंने हार न मानने का फैसला किया।

1967 में विमान के साथ मारेस्येव
Semyon Maisterman / TASS

कई महीनों तक वे पुनर्वास केंद्र में रहे, जहां उन्होंने फिर से चलना, दौड़ना और यहां तक कि नाचना भी सीखा। असहनीय दर्द झेलते हुए वे लगातार अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते रहे।

आखिरकार, वे डॉक्टरों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हो गए कि वे फिर से उड़ान भरने के लिए तैयार हैं। और 1943 की गर्मियों में उन्हें दोबारा मोर्चे पर लौटने की अनुमति मिल गई। युद्ध खत्म होने तक उन्होंने सात और जर्मन विमान मार गिराए।

सोवियत संघ का सबसे मशहूर पायलट

जुलाई 1943 में, जब मारेस्येव दोबारा वायुसेना में लौट चुके थे, तब ओर्योल के पास कहीं एक बंकर में उनकी मुलाकात ‘प्रावदा’ अखबार के संवाददाता बोरिस पोलेवोय से हुई।

युद्ध खत्म होने के तुरंत बाद पोलेवोय ने सिर्फ 19 दिनों में ‘एक असली इंसान की कहानी’ नाम का उपन्यास लिख डाला, जिसमें मारेस्येव की ज़िंदगी की इस अविश्वसनीय कहानी को बयान किया गया था।

यह किताब 1946 में छपी और देखते ही देखते द्वितीय विश्व युद्ध पर लिखी गई सबसे मशहूर रचनाओं में शामिल हो गई।

बोल्शोई थिएटर के मंच पर ‘एक असली मर्द की कहानी’ ओपेरा का एक दृश्य
Alexander Makarov / Sputnik

किताब छपने के बाद सोवियत संघ का हर बच्चा मारेस्येव का नाम जानने लगा। हालांकि, पोलेवोय ने उनके उपनाम में एक अक्षर बदल दिया था, इसलिए किताब में वे ‘मेरेस्येव’ के नाम से मशहूर हुए। इस उपन्यास की लाखों प्रतियां छपीं और जल्द ही इस पर फिल्म भी बनाई गई। लेकिन खुद मारेस्येव को यह शोहरत पसंद नहीं थी।

उनके बेटे के मुताबिक, “उन्हें उस दौर को याद करना अच्छा नहीं लगता था। किताब और फिल्म के बाद जो ज़्यादा ध्यान मिलने लगा था, वह भी उन्हें पसंद नहीं था।” वे अक्सर कहा करते थे, “हम सब लड़ रहे थे! दुनिया में मेरे जैसे कितने लोग रहे होंगे, जिनसे पोलेवोय की मुलाकात ही नहीं हुई।”

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