कैसे सोवियत घुड़सवारों ने... ज़ार (सम्राट) के लिए लड़ाई लड़ी

Arkady Shaikhet/russiainphoto.ru
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दिलचस्प बात यह है कि स्टालिन ने इस पर ज़रा भी आपत्ति नहीं जताई!

यह सितंबर 1941 में हुआ। एक सोवियत घुड़सवार सेना के डिवीजन को रूसी शाही सेना की उन तलवारों (शैशक) से लैस किया गया, जिन पर लिखा था – "ज़ा वेरू,ज़ार्या आई ओतेचेस्त्वो" (भरोसे , ज़ार और मातृभूमि के लिए)।

आमतौर पर ऐसे निशानों को हटा दिया जाता था, लेकिन इस बैच के साथ गलती हो गई। यह स्कैंडल तुरंत स्टालिन तक पहुँचा। उन्होंने आर्टिलरी विभाग (GAU) के चीफ जनरल निकोलाई याकोवलेव को बुलाया – जिनके गोदाम में ये तलवारें रखी थीं।

याकोवलेव ने याद किया:
"स्टालिन ने मुझे बुलाया और पूछा कि ये कैसी तलवारें हैं। मैंने कहा – ये असली जंगी तलवारें हैं। लेकिन मैंने माना कि गलती मेरी है, क्योंकि जिस गोदाम से ये गईं, वहाँ यह निशान नहीं हटाया गया – शायद समय नहीं मिला।"

उस मीटिंग में स्टालिन मुस्कुराए और पूछा – "क्या इन तलवारों से दुश्मन को काटा जा सकता है?" जनरल ने हाँ में जवाब दिया। तब स्टालिन ने हाथ हिलाते हुए कहा:
"तो फिर 'भरोसे, ज़ार और मातृभूमि' के नाम पर काटें – कोई हर्ज़ नहीं।"

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