GW2RU
GW2RU

प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन रूस कैसे पहुँचे और वहाँ उन्हें किस बात ने हैरान किया

Kira Lisitskaya (Photo: Legion Media; demerzel21/Getty Images)
वह रूसी ज़ार (सम्राट) के मुरीद हो गए, वहाँ उन्हें घर जैसा सुकून मिला, और प्यार भी हो गया।

दिसंबर 1866 में, एक जोशीले पत्रकार सैमुअल लैंगहॉर्न क्लेमेंस (जिन्हें दुनिया मार्क ट्वेन के नाम से जानती है) ने एक अखबार में "प्लेशर क्रूज़ थ्रू यूरोप एंड द होली लैंड" का विज्ञापन देखा। इस यात्रा की योजना कई महीनों के लिए बनाई गई थी और इसमें पेरिस, रोम, एथेंस, क़ुस्तुंतुनिया (अब इस्तांबुल) और सेवस्तोपोल जैसी जगहें शामिल थीं। वह इस रोमांचक सफ़र को छोड़ नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने कुछ अखबारों के प्रकाशकों को मनाया कि वे नियमित रिपोर्ट भेजने के बदले में उनकी यात्रा का खर्च उठाएँ।

दहशत से आनंद तक

जहाज 'क्वेकर सिटी'
Archive photo

अगस्त 1867 के अंत में, 'क्वेकर सिटी' जहाज़ क्रीमिया के सेवस्तोपोल में आकर रुका। मार्क ट्वेन जब किनारे पर उतरे तो उनके होश उड़ गए, इस शहर को तुर्कों, अंग्रेज़ों और फ्रांसीसियों ने तहस-नहस कर दिया था, जिससे उन्हें बहुत तक़लीफ़ पहुंची। उन्होंने लिखा,  "तुम जिधर भी देखो, तुम्हारी नज़र बस तबाही, तबाही और तबाही के अलावा कुछ नहीं देखती। ऐसा लग रहा था मानो किसी विकराल भूकंप ने इस ज़मीन को पूरे ज़ोरों से हिला दिया हो और उसे मरोड़ कर तहस-नहस कर दिया हो।"

हैरानी ओडेसा में हुई – दरअसल यह क्रूज़ के प्लान में नहीं था, जहाज़ वहाँ सिर्फ कोयला भरने के लिए रुका था। लेकिन ट्वेन उतरे और चौंक गए। सब कुछ जाना-पहचाना सा लगा। बोले, "ओडेसा बिल्कुल अमेरिकी शहर है। चौड़ी, सीधी सड़कें, छोटे-छोटे मकान, सफाई, फुटपाथों पर सफेद बबूल, बाजारों में धूल और धक्कम-धक्का – सब कुछ अमेरिका।" लेकिन तभी सामने एक चर्च आया और एक गाड़ी जिस पर ताँगेवाला बैठा था – और बस वह सारा भ्रम उसी पल गायब हो गया। वो चर्च का गुंबद उल्टे शलजम जैसा था, और ताँगेवाला ने लंबे घाघरे जैसा कुछ पहन रखा था।

मार्क ट्वेन
Public domain

वहाँ मेहमानों के लिए एक दावत थी, नाच-गाना था, और उसी दौरान मार्क ट्वेन की एक जवान लड़की से मुलाकात हुई। बाद में उन्होंने कहा, "हम लगातार बातें करते रहे, दिल खोलकर हँसे, फिर भी हममें से कोई यह नहीं समझ पाया कि सामने वाला क्या कहना चाह रहा है। मैं आज भी उस लड़की के बारे में सोचता हूँ। मैंने उसे खत लिखा, लेकिन भेजा नहीं – क्योंकि रूस में नामों का रिवाज ही कुछ ऐसा है, जिसे लिखने में हमारी अंग्रेज़ी वर्णमाला के अक्षर भी कम पड़ जाएं। असल में बोलने की हिम्मत नहीं होती, बस सपनों में ही दिल खोलकर बातें कर लेता हूँ। सुबह उठता हूँ तो जबड़ा जकड़ा होता है। बस, बेहाल हूँ।

रूसी सम्राट और चाँदी के चम्मच

सेवस्तोपोल
Archive photo

अमेरिकी लेखक को रूसी मेहमाननवाज़ी का अंदाज़ा तक नहीं था। वह दुश्मनी और अफसरशाही की लालफीताशाही की कहानियों से डरा हुआ था, लेकिन कहीं भी उनसे उनका पासपोर्ट तक नहीं माँगा गया। इसके बजाय, यात्रियों का स्वागत बड़े-बड़े अफसरों ने किया, जिन्होंने याल्ता में रूसी ज़ार अलेक्जेंडर दूसरे से मिलवाने का वादा किया – जहाँ वह उन दिनों अपने परिवार के साथ रुके हुए थे।

लेखक उस मुलाकात को उमर भर नहीं भूले; शाही परिवार ने मेहमानों का स्वागत बस सादगी और इज्जत के साथ किया। न फॉर्मल सूट, न बड़ी-बड़ी बातें, न अफसरशाही – बल्कि सच्ची दिलचस्पी और लगाव था।

"ज़ार हर बार दयालुता से बातें करते थे। उनमें रूसी चरित्र साफ झलकता है – सच्ची दयालुता। रूसी की दयालुता दिल से निकलती है – बातों में भी, अंदाज़ में भी – यही वजह है कि तुम्हें पक्का यकीन हो जाता है कि वह सच्ची है।"

ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय अपनी पत्नी और उनके बच्चों — ग्रैंड ड्यूक सर्गेई और ग्रैंड डचेस मारिया अलेक्जेंद्रोवना के साथ।
Public domain

बाद में, अपने खास हास्य-व्यंग्य के साथ, ट्वेन ने लिखा: "अगर मैं उनका कोट चुरा सकता, तो एक सेकंड भी न हिचकिचाता। जब भी मैं ऐसे इंसान से मिलता हूँ, मुझे हमेशा उससे कुछ न कुछ यादगार के तौर पर ले जाने का मन करता है।"

फिर मेहमानों को बगीचे में सैर करने के लिए कहा गया। "महारानी महिलाओं से खुलकर बातें कर रही थीं, कुछ सज्जन ज़ार से अलग-अलग विषयों पर बातें कर रहे थे; राजकुमार और काउंट, एडमिरल और सेविकाएँ आपस में बिना किसी रोक-टोक के बात कर रहे थे, और जिसका मन करता, वह आगे बढ़कर छोटी और सीधी सी ग्रैंड डचेस मारिया (जो ज़ार की बेटी थीं) से बात कर लेता था।"

लिवाडिया पैलेस
Archive photo

बगीचे की सैर के बाद अमेरिकियों को महल के अंदर बुलाया गया। मार्क ट्वेन को यह कुछ असामान्य लगा। वे उन महलों के अभ्यस्त थे जहाँ पर्यटकों को मखमली पोशाक पहने कोई नौकर घुमाता है। उन्हें व्यंग्यात्मक ढंग से यह विचार आया कि सम्राट ने जब स्वयं अपने निजी कक्षों का भ्रमण कराया है, तो एहतियात के तौर पर बाद में अपनी चाँदी की चम्मचों की गिनती भी कर लेनी चाहिए। लेकिन ग्रैंड ड्यूक मिखाइल के पास तो और भी अधिक वजह थी सावधान रहने की, क्योंकि उन्होंने इन पर्यटकों को अपने घर नाश्ते पर बुलाया था। फिर भी सब कुछ बड़ी सहजता और आत्मीयता से हुआ, जैसे मित्रों के साथ बिताया गया कोई पिकनिक।

ओडेसा।
Archive photo

रूस छोड़ते समय थोड़ी उदासी तो थी, लेकिन उसका जवाब हमेशा की तरह हँसी-मज़ाक से दिया गया। जहाज़ पर नाविक लगातार इस बात पर चुटकुले बनाते रहे कि रूसी कितने उदार निकले। एक स्वांग में ज़ार अपने भाई के पास कुछ अमेरिकी यात्रियों को भेज देता है और मज़ाक में यह भी कहता है कि बाद में चाँदी की चम्मचों का हिसाब ज़रूर देख लेना।

मार्क ट्वेन
Archive photo

इस लेख का पूरा वर्ज़न (रूसी में) 'रूस्की  मीर'  वेबसाइट पर मिल जाएगा।

और पढ़ें