रूस में 'चुमाक' (व्यापारी) क्या काम किया करते थे?
चुमाकों का तांता देखने लायक होता था — मर्द लंबे सींगों वाले दो या चार बैलों से खिंचती गाड़ियों के काफिले लेकर चलते थे। हर गाड़ी में पचास-साठ किलो नमक लद जाया करता था। दक्षिणी रूसी सल्तनत की इकोनॉमी काफी हद तक इन चुमाकों पर चलती थी। इनके लंबे सफर का असल मकसद था क्रीमिया, अज़ोव के दलदली इलाकों से और एल्टन व बासकुंचाक झीलों से नमक निकालना और उसे ढोना। नमक के बिना मांस और मछली को ज़्यादा दिनों तक स्टोर नहीं किया जा सकता था।
नमक के साथ-साथ वे नमकीन मछली (दोन और वोल्गा नदियों वाली), ब्रेड, खाल, शहद और मोम भी ढोते थे। उनके अपने पक्के रास्ते थे — 'चुमाकों के रास्ते'। ये रास्ते ओडेसा, क्रीमिया और दोन तक जाते थे। स्लोबोडा यूक्रेन से वे उत्तर में मॉस्को और उत्तर-पूर्व में निज़नी नोवगोरोद तक जाते थे।
'चुमाक' व्यापार — यानी सौदागरी और ढोने का काम — 16वीं से 19वीं सदी के दौरान मुख्य रूप से 'लिटिल रशिया' और दक्षिणी रूस में पुरुषों द्वारा किया जाता था। शोधकर्ताओं के मुताबिक, 'चुमाक' शब्द तुर्की भाषाओं से लिया गया है, जहाँ इसका मतलब होता है एक गदा या लंबी छड़ी। लेकिन चुमाकी व्यापार सिर्फ ढोने का काम नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति थी — जिसके अपने कानून, अपना रहन-सहन और अपने लोकगीत (मशहूर 'चुमाक गीत') तक थे।
इस काम में हर तरह के लोग जुटे थे — बड़े किसान, शहरी लोग, कोसैक, यहाँ तक कि ग़ुलाम तक, जो इससे कमाई करके कर चुकाते थे। कमाई इतनी अच्छी थी कि जिनके घर के मर्द चुमाक होते थे, वे अक्सर अपना अनाज खुद नहीं उगाते थे। मांस-दूध के लिए जानवर रखते थे, मुर्गी पालते थे, सर्दी के लिए चारा काटकर रख लेते थे। ज़मीन जोतने की नौबत ही नहीं आती थी — ब्रेड-सब्जी खरीदना आसान था।
खतरा भी बहुत था। खानाबदोशों और डाकुओं के हमलों का डर हर वक्त लगा रहता था, इसलिए चुमाक कभी अकेले नहीं चलते थे। वे बड़े हथियारबंद काफिलों में शामिल हो जाते थे, जिन्हें 'वाल्का' कहा जाता था। ऐसे काफिले में 15-40 से लेकर 100-300 तक गाड़ियाँ होती थीं। चुमाक को धारदार हथियार और बंदूक चलाना भी आता था।
एक 'वाल्का' बहुत ही सधा हुआ काफ़िला होता था। इसका मुखिया होता था एक चुना हुआ 'अतामान' — अनुभवी आदमी, जिसे रास्ते का पूरा इल्म होता था, काम बाँटता था, जिम्मेदारी तय करता था और झगड़ों की सुलह कराता था। कुछ "बुनियादी" काम भी होते थे, जैसे एक रसोइया (खाना या दलिया बनाने वाला), जो सामान और बरतन ढोता था और सबके लिए खाना पकाता था। इस काफिले का एक और अहम सदस्य होता था — एक मुर्गा, जो उनके लिए घड़ी का काम करता था और कभी-कभी रास्ता भी दिखाता था। घना कोहरा हो, तो यही मुर्गा सबको वापस काफिले तक ले आता था।
चुमाक यातायात की सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह बहुत धीमा होता था, फिर भी उसे काफी भरोसेमंद माना जाता था। लेकिन 19वीं सदी के मध्य तक, रेलवे के विस्तार की वजह से 'चुमाक' व्यापार घटने लगा। ट्रेनें माल ढोने का बहुत तेज, सस्ता और असरदार जरिया साबित हुईं। सदी के आखिर तक, यह पेशा लगभग खत्म ही हो गया।