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सोवियत स्नाइपर जर्मन स्नाइपर से बेहतर क्यों थे?

А. Petrov / Sputnik
मिलिट्री इतिहासकार एलेक्सी इसायेव के अनुसार, "जर्मनी में स्नाइपर मूवमेंट, जो पहले वर्ल्ड वॉर के दौरान शुरू हुआ, पूरी तरह फेल हो गया था। बाद में सोवियत स्नाइपर्स के अनुभव के बाद इसे फिर से शुरू किया गया।"

दूसरे विश्व युद्ध (WWII) के 50 बेहतरीन स्नाइपर की लिस्ट में लगभग सारे नाम रेड आर्मी के हैं। यह कोई संयोग नहीं है – यह सालों की मेहनत और तैयारी का नतीजा था।

यह सब 1920 के दशक के आखिर में शुरू हुआ। 'विस्ट्रेल' कमांड ट्रेनिंग कोर्स के टीचर ग्रिगोरी मोरोज़ोव जैसे लोगों ने सेना का ध्यान इस तरफ खींचा। अब स्नाइपर को सिर्फ अच्छा निशानेबाज नहीं समझा जाता था। वह एक टैक्टिकल यूनिट बन गया था – जिसे छुपना, ढूंढ़ना और पता लगाना आता था। उनकी ट्रेनिंग अब सोच-समझकर की जाती थी, और स्नाइपिंग पर बहुत सारी किताबें छपने लगीं।

सबसे बड़ी बात यह थी कि रूस में निशानेबाजी अनिवार्य कर दी गई थी। चाहे मर्द हो, औरत हो या फिर किशोर – सबको देश की रक्षा के लिए तैयार रहना था। जो नियम पास कर लेता, उसे 'वोरोशिलोव्स्की स्ट्रेलोक' (वोरोशिलोव निशानेबाज) का बैज मिलता। इसका नाम तत्कालीन रक्षा मंत्री क्लीमेंट वोरोशिलोव के नाम पर रखा गया था।
1939 में यह बैज मशहूर ल्यूडमिला पावलीचेंको को भी मिला – जिसने अकेले 309 दुश्मनों को मार गिराया था।

जर्मनी में ऐसा कुछ नहीं था
जर्मनी ने स्नाइपरों को सिस्टमेटिक तरीके से ट्रेन करना युद्ध के बीच में कहीं जाकर शुरू किया। जर्मनी के बेहतरीन स्नाइपर योज़ेफ़ एलेरबर्गर ने अपनी याद में लिखा है:
"अभ्यास से पहले हमें एक फिल्म दिखाई गई। वह फिल्म... रूसी थी (नीचे जर्मन सबटाइटल थे)। वह फिल्म 1935 में बनी थी और उसमें रूसी तैयारी का बहुत ऊंचा लेवल दिखाया गया था – देखकर हम सब हैरान रह गए थे।"

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