कैसे एक ग़ुलाम किसान रूस का 'वोदका किंग' बना
प्योत्र स्मिर्नोव रूसी साम्राज्य के इतिहास के सबसे सफल कारोबारियों में से एक थे। अपनी समझदारी और मेहनत के दम पर वह देश के सबसे अमीर लोगों में शामिल हो गए। उनकी शुरुआत भी बुरी नहीं थी – उनके पिता और चाचा, जो खुद सर्फ़ (ज़मींदार के ग़ुलाम) थे, ने ज़मींदार की इजाजत से शराब का कारोबार शुरू किया था, जो इतना कामयाब हुआ कि खुद और अपने सारे रिश्तेदारों को आज़ाद करा लिया।
जवानी में प्योत्र ने अपने चाचा की शराब की दुकान पर क्लर्क का काम किया। तीस साल की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते, उनके पिता ने उन्हें एक दुकान की ज़िम्मेदारी दे दी। अपनी कारोबारी समझ की बदौलत, उन्होंने जल्द ही कई दुकानें और एक छोटी फैक्ट्री भी खड़ी कर ली।
जल्द ही, स्मिर्नोव के रेसिपी के हिसाब से बनी वोदका, वाइन, लिकर और शरबत ने पूरे मॉस्को में धूम मचा दी। इसकी वजह थी उनका जुनून – वह खुद कच्चे माल की क्वालिटी चेक करते, दूर-दराज़ इलाकों से ज़रूरी जड़ी-बूटियाँ और जामुन मँगवाते, और पैसे की कोई कसर नहीं रखते। वह मार्केटिंग के भी माहिर थे – उन्होंने अपनी मुख्य दुकान की तस्वीर बोतलों पर चिपकाई, और कुछ लोगों को भाड़े पर रखा जो पब में जाकर ज़ोर से "स्मिर्नोव्का" लाओ चिल्लाते थे।
'वोदका किंग' के यहाँ काम करना कई लोगों का सपना था – उनकी फैक्ट्रियों में "हैप्पी वर्कर = प्रोडक्टिव वर्कर" का नियम चलता था। वहाँ कभी कोई हड़ताल या विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ।
स्मिर्नोव ने अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में सभी प्रतिष्ठित पुरस्कार जीते, और 1886 में वह महामहिम सम्राट के दरबार के सप्लायर" बन गए। 19वीं सदी के अंत तक, उनकी शराब कंपनी, जिसमें 5,000 कर्मचारी थे, उत्पादन के मामले में सबसे बड़ी और साम्राज्य के सबसे बड़े करदाताओं में से एक बन गई।
1898 में स्मिर्नोव की मृत्यु हो गई। 1917 की क्रांति के बाद, उनकी कंपनी को सरकार ने नेशनलाइज़ कर दिया। उनके वंशजों ने रूस छोड़ दिया और उनके कारोबार को 'स्मिर्नॉफ' ब्रांड के नाम से फिर से शुरू किया। आज यह ब्रांड ब्रिटिश कंपनी के पास है।