5 रूसी उपन्यास जिन्हें लिखने में सालों लगे — आइए जानें
रूसी साहित्य में ऐसी किताबों की कोई कमी नहीं, जिन पर दशकों तक काम चलता रहा। लेकिन दिलचस्प यह है कि इन किताबों की अंदरूनी समयरेखा अक्सर बहुत छोटी होती है। तो आखिर वो कौन सी किताबें हैं, जिन्हें लिखने में लेखकों ने 15, 20 या फिर 50 साल लगा दिए?
1. अलेक्सान्द्र सोल्शेनीत्सिन – 'द रेड व्हील': 53 साल (1936–1989)
'द रेड व्हील' एक महाकाव्य उपन्यास है, जो रूस की तकदीर की कहानी बयान करता है। इसमें पहला विश्व युद्ध, फरवरी और अक्टूबर क्रांति (1914–1917) का दौर दिखाया गया है। उपन्यास का अपना समय बहुत छोटा है, लेकिन सोल्शेनीत्सिन ने इस पर साढ़े पचास साल से ज़्यादा काम किया — 1936 से 1989 तक। यह विचार 1936 की शरद ऋतु में एक 17 साल के छात्र के दिमाग में आया: "रूसी क्रांति पर एक बड़ा उपन्यास" लिखना। हालाँकि, असली काम 1960 के दशक में शुरू हुआ, जब 'वन डे इन द लाइफ ऑफ इवान देनिसोविच' को सफलता मिली। इस दौरान उनकी परिस्थितियाँ बदलती रहीं। उन्होंने पहले सोवियत संघ में लिखा, फिर निर्वासन में, जहाँ उन्हें आर्काइव मिले। 1989 में उन्होंने मुख्य दस भाग पूरे कर लिए और 1990 के दशक में रूस लौटकर उसे अंतिम रूप दिया।
2. एलेक्सी निकोलाइविच टॉल्स्टॉय – 'द रोड टू कैल्वरी' ('द ऑरडील'): 23 साल (1918–1941)
एमिग्रेंट मैगज़ीन 'द कमिंग रशिया' में पहला प्रकाशन
टॉल्सटॉय ने इसकी पहली रूपरेखा 1918 की गर्मियों में ओडेसा में लिखी। पहले भाग पर ज़्यादातर काम निर्वासन में हुआ — पहले पेरिस में, फिर बर्लिन में। 1922 में यह किताब 'द रोड टू कैल्वरी' नाम से छपी। यह रचना उदासी और निकट आती विपत्ति के आभास से पूरी तरह ओतप्रोत थी। लेकिन 1923 में टॉल्सटॉय सोवियत रूस लौट आए। फिर उन्होंने पूरी पहली किताब को नए सिरे से लिखा और उसे नई विचारधारा के अनुसार ढाल दिया। यह नया संस्करण 'सिस्टर्स' नाम से छपा। पूरी ट्रिलॉजी का नाम रखा 'द रोड टू कैल्वरी'। अक्टूबर क्रांति की दसवीं सालगिरह के उपलक्ष्य में 'द एटीन्थ इयर' पूरा किया। कहानी और भव्य हो गई — निजी ज़िंदगी की कहानी अब एक ऐतिहासिक तस्वीर बन चुकी थी। आखिरी भाग 'अ ग्लूमी मॉर्निंग' उन्होंने 22 जून 1941 को पूरा किया — यही वह दिन था जब ग्रेट पैट्रियोटिक वॉर शुरू हुआ।
3. इवान गोंचारोव – 'द प्रेसिपिस': 20 साल (1849–1869)
पहला प्रकाशन (पत्रिका "वेस्तनिक एवरोपी", 1869, No. 1 में)
गोंचारोव के मन में इस उपन्यास का विचार 1849 में आया, जब वह 14 साल बाद अपने घर सिम्बिर्स्क लौटे। वहाँ उन्होंने पुरानी परंपराओं और नए बदलावों के बीच जो अंतर देखा, वही इस उपन्यास का मुख्य विषय बन गया — पुराने और नए के बीच टकराव। लेकिन इस पर काम खिंचता चला गया। 1852 में गोंचारोव 'पल्लाडा' नाम के जहाज़ पर दुनिया की सैर पर निकल पड़े, जहाँ उन्होंने एक ट्रैवल जर्नल बनाया। 1859 में उन्होंने 'ओब्लोमोव' उपन्यास पूरा किया और छापा। 1860 के दशक में इवान तुर्गनेव के साथ हुए विवाद ने गोंचारोव के लेखन को गहरा प्रभावित किया। उन्होंने तुर्गनेव पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनके भविष्य के उपन्यास के विचारों और ढाँचों का इस्तेमाल अपनी रचनाओं 'अ नेस्ट ऑफ द जेंट्री' और 'ऑन द ईव' में किया। आखिरकार 'द प्रेसिपिस' 1869 में प्रकाशित हुआ। लेकिन समकालीन रीडर्स ने इसकी कड़ी आलोचना की, क्योंकि इसमें क्रांतिकारी युवाओं का चित्रण अत्यधिक व्यंग्यात्मक था।
4. निकोलाई गोगोल – 'डेड सोल्स': 17 साल (1835–1852)
पहले एडिशन का टाइटल पेज
इस उपन्यास (जिसे गोगोल खुद गद्य कविता कहते थे) के पीछे की कहानी रूसी साहित्य की सबसे नाटकीय है। पुश्किन ने गोगोल को यह कहानी दी थी। निर्वासन में पुश्किन ने एक ठग की कहानी सुनी। वह ठग मरे हुए किसान खरीदता था, लेकिन दस्तावेज़ों में ज़िंदा दिखाए जाते थे। गोगोल ने तुरंत काम शुरू कर दिया। लेकिन बाद में गोगोल का नज़रिया बदल गया। वह इसे महज़ एक साहसिक उपन्यास नहीं मानते थे। उन्होंने तीन भागों में एक भव्य कविता लिखने का फैसला किया, जो दांते की 'डिवाइन कॉमेडी' पर आधारित थी। योजना थी: नायक चिचिकोव की यात्रा नैतिक पतन (भाग 1: 'नर्क') से शुद्धिकरण (भाग 2: 'पुर्गेटरी') से होते हुए आध्यात्मिक पुनर्जन्म (भाग 3: 'स्वर्ग') तक जाए। पहला भाग 1841 में रोम में पूरा हुआ। दूसरे भाग पर काम मुश्किल रहा। गोगोल को रचनात्मक और आध्यात्मिक संदेह सताने लगे। जुलाई 1845 में उन्होंने दूसरे भाग की मैन्युस्क्रिप्ट जला दी। सिर्फ एक नोटबुक बची, जिसमें आखिरी अध्याय था। दुखद अंत 1852 में आया। 11-12 फरवरी की रात को गोगोल ने लगभग पूरी हो चुकी दूसरे भाग की मैन्युस्क्रिप्ट जला दी। नौ दिन बाद वह चल बसे और ट्रिलॉजी अधूरी रह गई।
5. मिखाइल शोलोखोव – 'क्वाइट फ्लोज़ द डॉन': 15 साल (1925–1940)
रोमन-गज़ेता पत्रिका, 1928
शोलोखोव ने शुरू में कोई बड़ा उपन्यास लिखने की नहीं सोची थी। 1925 में उन्होंने 'दोन्शचीना' नाम से एक छोटी सी कहानी लिखनी शुरू की। इस कहानी में कोसैक्स केंद्र में था — कैसे उन्होंने क्रांति को रोकने में हिस्सा लिया। लेकिन जल्द ही यह विचार एक बहुत बड़े उपन्यास में बदल गया।
शोलोखोव ने पहले तीन भाग बहुत जल्दी लिख डाले — लगभग ढाई साल में (1926 के ऑटम से 1928 के ऑटम तक)। लेकिन बाहरी वजहों (जैसे सेंसरशिप) की वजह से यह काम देर से पूरा हुआ। चौथा भाग 1940 में खत्म हुआ।
इस उपन्यास के लिए शोलोखोव को 'स्टालिन पुरस्कार' (1941) और 'नोबेल पुरस्कार' (1965) मिला।
हालाँकि, यह भी कहा जाता है कि शोलोखोव ने यह मैन्युस्क्रिप्ट एक मरे हुए कोसैक लेखक फ्योडोर क्रायुकोव से पाई थी। इस बात को खुद अलेक्सान्द्र सोल्शेनीत्सिन ने भी स्वीकारा।