USSR चाहने के बावज़ूद चाँद पर क्यों नहीं उतर पाया?
1962 में चाँद पर एक पूरा बेस बनाने की योजना बनी थी – 12 कॉस्मोनॉट्स के लिए, जो एक खास लूनर ट्रेन में सतह पर घूम सकते थे।
लेकिन यह प्रोजेक्ट बहुत महंगा था, इसलिए सिर्फ एक आदमी को उतारने की तैयारी शुरू हुई। पहली मानवयुक्त उड़ान 1968 तक प्लान की गई थी।
इसके लिए एक सुपर-हेवी रॉकेट N-1 बनाया जा रहा था। यह चाँद की कक्षा में दो शटल ले जाता – एक लैंडिंग के लिए और एक ऑर्बिट में रहने के लिए। हर शटल में एक-एक कॉस्मोनॉट होता।
प्लान यह था: लैंडिंग वाला शटल चाँद पर उतरता, कॉस्मोनॉट चाँद पर कदम रखता, फिर शटल वापस उड़ता, दूसरे शटल से डॉक करता, और दोनों पृथ्वी लौट जाते।
लेकिन सोवियत चाँद मिशन पर बदकिस्मती का पहाड़ टूट पड़ा:
🔸 पैसों की कमी थी।
🔸 N-1 रॉकेट चार बार टेस्ट में फट गया – कभी सही नहीं हुआ।
🔸 डिज़ाइन ब्यूरो के बीच आपसी खींचतान थी।
1966 में सर्गेई कोरोल्योव (चीफ डिज़ाइनर) की मौत हुई। 1967 में कॉस्मोनॉट व्लादिमीर कोमारोव की दुर्घटना में मौत हुई, और 1968 में यूरी गगारिन की भी। ये तीनों ही चाँद मिशन के मुख्य दावेदार थे।
1969 में अमेरिका चाँद पर उतर गया। USSR का मन हार गया। कुछ वैज्ञानिकों ने लूनर बेस बनाने की बात कही, लेकिन सरकार ने 1970 के दशक की शुरुआत मेंयह प्रोग्राम पूरी तरह बंद कर दिया।